
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
० पर्याप्त साक्ष्य रहते हुए भी ‘राजेश तलवार और नूपुर तलवार’ दोषमुक्त हो गयीं।
० माले-विस्फोट-प्रकरण के अभियुक्त दोषमुक्त हो गये।
० गुजरात-काण्ड के दोषी मुक्त हो गये।
० जामा मस्जिद-काण्ड के अपराधी अपराधमुक्त हो गये।
० ‘टु-जी स्पेक्ट्रम’ काण्ड में अप्रत्याशित निर्णय देखने को मिला।
० “जज लोया की मौत की जाँच नहीं” जैसा उच्चतम न्यायालय का आदेश मन को शंकालु बना रहा है।
इनके अतिरिक्त कई राज्यों के उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय की ओर से सुनाये गये बहुत सारे निर्णय हमारे मन, बुद्धि, चित्त को सन्दिग्ध बना रहे हैं और स्वयं से प्रश्न करने के लिए विवश कर रहे हैं। उदाहरण के लिए— एक-जैसे अपराध में पहलेवाले अपराधी की २१ वर्ष की सज़ा पूरी तरह से समाप्त और दूसरे अपराधी की २८ वर्ष की सज़ा २१ वर्ष यदि कर दी जाये तो दोनों के निर्णय पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। वहीं यह प्रश्न उठना औचित्यपूर्ण है कि जिन साक्ष्यों के आधार पर अभियुक्त को सज़ा सुनायी गयी थी, वही साक्ष्य बाद में इतने कमज़ोर और प्रभावहीन कैसे सिद्ध हो गये कि अभियुक्त को ससम्मान दण्डमुक्त कर दिया गया। ऐसे में, संशय की सुई यदि न्यायालय की ओर जाती है तो किसी भी न्यायाधीश को अप्रसन्न नहीं होना चाहिए। कभी-कभी मानवीय भूलें भी हो जाती हैं।
जज लोया की मृत्यु होने की प्रक्रिया को यदि गम्भीरतापूर्वक देखा-समझा जाये तो प्रथम दृष्टि में वह ‘हत्या’ का प्रकरण बनता है; क्योंकि जज लोया एक ऐसे उच्चस्तरीय प्रकरण की जाँच-परख कर सुनवाई करने की स्थिति में आ चुके थे, जिसमें एक अभियुक्त भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह थे। चूँकि इस समय समूचे देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और वह जिस प्रकार से देश को संचालित कर रही है, उसे देख-समझकर यदि किसी के मन में न्यायालय को प्रभावित कर न्याय को अपने पक्ष में कराने का विचार उठता है तो वह अनुचित नहीं है; क्योंकि शंकालु मन पर किसी का नियन्त्रण नहीं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, २१ अप्रैल, २०१८ ई०)