डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
कोई यदि कहता है— हमारा धर्म कहता है कि हम ‘अल्लाह’ के अलावा और किसी की पूजा नहीं कर सकते; परन्तु वह व्यक्ति इस धरती माँ के साथ बेइन्तिहाँ मुहब्बत करता है। दूसरी ओर, वह यह भी कहता है— हम “वन्दे मातरम्” नहीं कहेंगे; नहीं कहेंगे; नहीं कहेंगे। ऐसे में, कोई किसी पर “वन्दे मातरम्” कहने का दबाव बना सकता है क्या? उसके “वन्दे मातरम्” कहने अथवा न कहने से देश के स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव पड़ सकता है क्या? कहीं ऐसा तो नहीं, ऐसी वर्ज्य दीवार बनाकर दबाव डालनेवाले लोग देश में साम्प्रदायिक विद्वेष का वातावरण बनाकर, राजनीति के गरम तवे पर स्वार्थ की रोटियाँ सेंकने के लिए तत्पर हैं?
वास्तव में, आज ऐसा साम्प्रदायिक सद्भाव बनाने की आवश्यकता है कि “वन्दे मातरम्” नहीं कहनेवाला व्यक्ति स्वत: राष्ट्रीय धारा में गोते लगाने लगे और दूसरों को भी “वन्दे मातरम्” कहने के लिए तैयार किये जा रहे परिवेश में अपनी सहभागिता कर सके।
तो आज ऐसे ही वातावरण बनाने की आवश्यकता है, जिसके प्रभावस्वरूप भारतीय समाज ‘निरापद’ रह सकता है।
किसी भी वैषम्य को दूर कर ‘साम्य’ स्थापित करने के लिए ‘संवाद’ को माध्यम’ बनाना चाहिए; किसी भी क्रिया की ‘प्रतिक्रिया’ करते समय विषय की संवेदनशीलता को समझना अनिवार्य है।
आज देश में जो भी समरसता शेष है, उसे ‘हिन्दू बनाम मुसलमान’ के रूप में प्रस्तुत कर, विषाक्त किया जा रहा है और हमारा बुद्धिजीवी-वर्ग मौन साधे हुए है, जो कि राष्ट्र के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २८ जुलाई, २०१८ ईसवी)