राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास हेतु ‘भ्रष्टाचार की लत’ छोड़नी होगी

आरती जायसवाल (साहित्यकार, समीक्षक)

आज हमारा राष्ट्र जिस परिवर्त्तन के दौर से गुज़र रहा है उसमें एक ओर विकास की छलाँग है तो दूसरी ओर महँगाई की मार एक ओर भारत अंतरिक्ष में अपना स्टेशन बनाने वाला चौथा देश बनने जा रहा है व चन्द्रमा पर पहुँच रहा है ,तो दूसरी ओर धरातल पर बदहाल व्यवस्थाएँ अरबों की जनहितैषी योजनाओं को मुँह चिढ़ा रही हैं जो येनकेन -प्रकारेण भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर निरीह जन के प्राणों को भी नहीं छोड़ रही हैं ।

भ्रष्टाचार में भारत विश्व में ७८वें स्थान पर है जो एक वर्ष पूर्व ८१वें स्थान पर था, जिसे समाप्त करना और राष्ट्र को विकास की गति देना एक विकासशील देश के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। वर्तमान में सभी सार्वजनिक क्षेत्र पूरी तरह से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं तथा अपनी सार्थकता पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।

जुलाई २०१९अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के आकलन के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था एक ओर विश्व की छठीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन कर अपनी तीव्रगामी उपस्थिति दर्ज़ करा रही है तो दूसरी ओर देश में महँगाई भी अपनी चरम पर है। वस्तुओं की कीमतों और मिलावट में उतनी ही तीव्र गति से वृद्धि हो रही है ।

प्रगति संतोषजनक है तो महँगाई कमर तोड़

पूर्ववर्ती सरकारों ने जिस प्रकार देश के जनमानस के साथ समय-समय पर विश्वासघात किया है वह निन्दनीय और जगजाहिर है उनकी छल और ठग पूर्ण नीतियों के कारण ही जन मानस ने उन्हें दर किनार कर दिया है। सत्तासीनों को इस उदाहरण से सबक लेना चाहिए और यदि उन्हें अपनी अच्छी व विश्वसनीय छवि बनाए रखना है तो नीतियाँ बनाते समय वर्त्तमान सरकार को इस बात का भी पूरा ध्यान रखना होगा।

वर्तमान सरकार भ्रष्टाचार को ख़त्म करने और समग्र विकास करने का जो अभियान लेकर पूर्ण बहुमत से सत्तासीन हुई है और प्रयासरत भी है कि सम्पूर्ण राष्ट्र का समग्र विकास हो इसलिए वह पुरज़ोर कोशिशें कर रही है। अपनी नीतियों में बदलाव, लोगों से राष्ट्र के विकास के लिए आह्वान जिसमें उनके विचारों से लेकर उनकी भागीदारी भी शामिल है ।

जनकल्याणकारी अनेकों योजनाएँ जिन्हें गूगल मैपिंग और ऑनलाइन आंकडों से जोड़कर पारदर्शी बनाने और भ्रष्टाचार को मिटाने का सद् प्रयास किया जा रहा है इसके बावज़ूद भ्रष्टाचार मिटने का नाम नहीं ले रहा वस्तुतः अधिकांश लोग को भ्रष्टाचार और मुफ्तखोरी की लत लग चुकी है जिसमें सरकार की कुछ ऐसी योजनाएँ हैं जो इसे बढ़ावा दे रही हैं। वर्तमान सरकार को चाहिए कि वह मुफ़्त की परियोजनाओं के स्थान पर रोज़गारपरक योजनाओं को बढ़ावा दे।

विकास की ओर दौड़ती हुई सरकार ने आज जिस प्रकार से जिम्मेवारी का जुआ निम्न मध्यम वर्ग  लोग के जर्जर कन्धों पर रखा हुआ है और उनका भार बढ़ाती जा रही है यह सर्वथा अनुचित ही नहीं जनमानस के साथ क्रूरता भी है।

“मध्यम वर्ग वोट बैंक भी ,नोट बैंक भी 

दिन-रात एक करके ,भूखो मरके, घर ज़ेवर इत्यादि बेचकर अपना रोज़गार खड़ा करता है,नफ़ा नुक़सान भुगतता है तब निम्न वर्ग ही मध्यम वर्ग बनता है और ठगा जाता है। देश की बदहाल व्यवस्था से लेकर नेताओं और उद्योगपतियों के खर्चों और क़र्जों की भरपाई के भार तले दबे ही दबे उसका जीवन समाप्त हो जाता है। जिस विकास के लिए वर्तमान सरकार २०१९और२०२२ तक का समय माँग रही है उसी विकास के लिए लोगों पर अनावश्यक रूप से मँहगाई का बोझ डालना तथा विकास की सारी क़ीमत वसूलना वर्षों से छल की शिकार और गरीबी तथा बेरोज़गारी से जूझते जनमानस के साथ अन्याय है।

भारत की वर्त्तमान सरकार को चाहिए कि वह पहले गरीबी और भुख़मरी से लड़ती हुई जनता को पेटभर रोटी और रोजगार मुहैया करवाए तत्पश्चात् भारी-भरकम विकास का जुआ उनके कन्धों पर रखे। उन्हें पहले इस योग्य बनाएँ कि बढ़ती मँहगाई भी उन्हें सहज लगे उन्हें भी उतना ही समय प्रदान करें जितना कि वर्त्तमान सरकार स्वयं के लिए माँग रही है तथा सभी सत्ताधारी भी राष्ट्र के विकास में अपना योगदान सुनिश्चित करें । राष्ट्रनिर्माण हेतु उन्हें भी अनावश्यक उपभोगों का त्याग करना चाहिए ताकि राष्ट्र का समग्र विकास हो सके।

हम प्रति वर्ष नेताओं पर १००अरब रूपये से भी अधिक खर्च करते हैं,किन्तु; दुःखद और शोचनीय कि बदले में गरीब लोग को  प्राप्त होता है दिनोंदिन उनके ही बढ़ते खर्चों का बोझ । राष्ट्र विकास के बदले में आर्थिक विषमता  का गह्वर जो जन को अनावश्यक संघर्ष और अन्धकारमय भविष्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकता। देशवासियों का सकारात्मक रवैया देखते हुए अब समय आ गया है  स्वार्थपूर्ण नफ़ा-नुक़सान की गणित से दूर हो कर वर्त्तमान सरकार नया इतिहास लिखे।

राजनीतिक ख़र्चे को पूरा करने और बड़े-बड़े लोन धारकों से हुई बैंकों की हानि की भरपाई के लिए बार- बार कर प्रणाली में जो परिवर्त्तन किए जा रहे हैं उससे बिचौलियों और मुनाफ़ाख़ोरों में बढ़ोत्तरी हो रही है, निम्न मध्यम वर्ग पर आर्थिक बोझ दिनों दिन बढ़ता जा रहा है । लाख प्रयास के बावजूद महंगाई की बढ़ती दर बराबर विकास की बढ़ती दर हो रही है।

अनाप-शनाप सरकारी खर्चों और दौरों पर भी लगाम लगनी चाहिए। वर्त्तमान सरकार को विपक्ष अथवा अन्य दलों को नीचा दिखाने और अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए किए जाने वाले अनावश्यक खर्चों और व्यर्थ की भाषणबाजी भी बन्द करनी चाहिए।अनावश्यक नियमों जैसे -बैंक में निम्नतम राशि अनिवार्य करना अन्यथा दण्ड स्वरूप राशि कटौती आदि लादकर निम्न मध्यम वर्ग की क़मर तोड़ना उचित नहीं।

उज्जवला योजना के तहत मुफ़्त सिलेण्डर का कनेक्शन दे देना तत्पश्चात् दाम में कई गुना की वृद्धि कर के योजना उपभोक्ताओं को परित्याग करने को विवश कर देना व अन्य उपभोक्ताओं को वसूली का माध्यम बनाना आदि कई ऐसी चालाक नीतियाँ वर्त्तमान सरकार द्वारा किए जा रहे क्रूर और अमानवीय छल का परिचय देती हैं यही छल पूर्ववर्ती सरकारें भी करती थीं। वर्त्तमान सरकार को जनमानस के लिए नियमों को बनाते समय विगत और वर्त्तमान परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए ताकि उन्हें कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।

आधार और ऑनलाइन कार्य पद्धति निस्सन्देह सराहनीय और जनकल्याणकारी है किन्तु; अत्यन्त अनिवार्य आधार कार्ड में हुई अशुद्धियाँ भी अनेक परेशानियों का कारण बन रहा है। जिस प्रकार से हमारा राष्ट्र परिवर्त्तन के दौर से गुज़र  रहा है अवश्य ही अतिशीघ्र विश्व के अग्रणी देशों में शामिल हो जाएगा । कृषि कल्याण कारी योजनाएँ, जन कल्याणकारी योजनाएँ, लघु एवं गृह उद्योग हमारे राष्ट्र को पुनः कृषि प्रधान देश और विश्वगुरू बनने की ओर ले जा रही हैं जो सराहनीय और स्वागत योग्य है।

वर्त्तमान सरकार को नियमों और नीतियों को और भी अधिक सकारात्मक और सही बना कर नई उड़ान भरनी होगी तथा राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास हेतु सर्वप्रथम  सभी को  भ्रष्टाचार की लगी हुई लत छोड़नी होगी

समग्र राष्ट्र का सम्पूर्ण विकास तभी सम्भव है जब राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक शिक्षक से विद्यार्थी तक, किसान से जवान तक, अभिनेता से नेता तक, व्यापारी से सरकारी तक, गृहिणी से कामकाजी तक, साहित्यकार से लेकर अख़बार तक, ग्राम प्रधान से प्रधानमन्त्री तक सब अपनी सही और ईमानदार भूमिका निभाएँ तभी जर्जर राष्ट्र का नव निर्माण हो सकेगा और एक नई क्रान्ति आ सकेगी।

क्योंकि; उन्हें जनमानस ने सही की स्थापना हेतु चुना है न कि ग़लत की पुनरावृत्ति हेतु। वैचारिक क्रान्ति के साथ-साथ वैयक्तिक क्रान्ति भी अति आवश्यक है वर्त्तमान सरकार यदि अपनी अच्छी छवि बनाए रखना चाहती है तो उसे इन सब बातों का भी ध्यान रखना होगा।

आरती जायसवाल (प्रतिष्ठित साहित्यकार)