मित्रता पाने की नहीं करने की चीज है।
प्रेम तो मैत्री से भी ऊंचा है।
प्रेम बाहर से नहीं मिलेगा।
प्रेम तो प्रत्येक को अपने भीतर जगाना होता है वह भी अपने से अधिक श्रेष्ठ व्यक्ति के प्रति।
निकृष्टों को कभी उत्कृष्टों से प्रेम नहीं मिलता।
कृष्ण कभी सुदामा को प्रेम करने नहीं जाते,
बल्कि सुदामा को ही कृष्ण की ओऱ जाना पड़ता है।
इसका अभिप्राय यह नहीं कि कृष्ण के भीतर प्रेम नहीं है।
प्रेमपूर्ण लोग अपने से निम्न जनों को न्याय देते हैं प्रेम नहीं।
अतः अपने संगठन में जो श्रेष्ठ लोग हैं वे अन्य लोगों को न्याय दिलाने के लिए निरन्तर कार्यरत हैं।
प्रियता नीचे की ओर हो तो पतन करती है।
प्रियता ऊपर की ओर हो तो उत्थान करती है।
निर्णय खुद का है उत्थान या पतन।
छोटों के लिए स्नेह और आशीष दिया जाता है प्रेम नहीं।
और समकक्ष के लिए मैत्री।
प्रियता तो श्रद्धा और समर्पण की ओर ले जाती है।
जो जिसको प्रेम करता है उसी में विलीन हो जाता है।
जैसे मीरा ने कृष्ण को प्रेम किया और उन्हीं में विलीन हो गईं।
श्रेष्ठ व्यक्ति निकृष्ट से कभी प्रेम नही करता।
वह उनकी मदद कर सकता है प्रेम नहीं।
प्रेम कभी नहीं।
जो जिसको प्रेम करता है वह उसकी आज्ञा मानता है।
निकृष्ट की आज्ञा मानकर उत्कृष्ट की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी।
राम भी रावण को स्नेह करते है प्रेम नहीं।
क्योंकि राम श्रेष्ठ हैं रावण से।
अतः रावण की आज्ञा नहीं मानते राम।
छोटों के लिए दुलार और स्नेह ही उचित है प्रेम नहीं।
लेकिन कोई कहे कि जिसको अपने से निम्न को प्रेम नहीं तो वह कैसा श्रेष्ठ?
श्रेष्ठ की क्या परिभाषा है..?
ज्ञान, गुण, योग्यता, क्षमता, कौशल, पात्रता ही उत्कृष्टता या श्रेष्ठता का आधार है।
जैसे अर्जुन ने कृष्ण से प्रेम किया दुर्योधन से नहीं।
दुर्योधन ने शकुनि से प्रेम किया कृष्ण से नहीं।
अर्जुन का उत्थान हुआ
दुर्योधन का पतन हुआ।
श्रेष्ठजनों से प्रेम हो तो उत्थान होता है।
निकृष्ट जनों से प्रेम हो तो पतन होता है।
आप खुद दूसरे श्रेष्ठजनों को प्रेम करना सीखिए।
दूसरों से प्रेम मांगिये नहीं।
प्रेम मांगने की नहीं बल्कि देने की चीज है।
जो कोई प्रेम मांगता है उसकी झोली हमेशा खाली रहती है।
जो प्रेम देता है उसकी झोली हमेशा भरी रहती है।
प्रेम देने से बढ़ता है मांगने से घटता है।
✍️🇮🇳 राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा