शून्य अंक के जनक भारतीय महाविज्ञानी आर्यभट को नमन

आज 'राष्ट्रीय गणित-दिवस' है
विश्व को अप्रतिम अंक 'शून्य' (०) प्रदान करनेवाले भारतीय महाविज्ञानी 'आर्यभट को नमन।

‘गणित’ शब्द का जैसे ही प्रस्फुटन होता है, हमारे समक्ष उपग्रहविज्ञान’ के आदि-प्रणेता ‘आर्यभट’ और महान् गणितविज्ञानी ‘श्रीनिवास रामानुजन्’ की छवि घूम उठती है। आर्यभट की उत्कृष्ट कृति ‘आर्यभटीय’ के दो भाग हैं :—
१- दशगीतिका
२-आर्याष्टशत।
इस गणित-खगोल-विषयक ग्रन्थ में चार पाद हैं :—
पाद अर्थात चरण
१- गीतिकापाद
२- गणितपाद
३-कालक्रियापद
४-गोलपाद।

प्रासंगिक ‘गणितपाद’ में दशगुणोत्तर संख्याओं के नाम, वर्ग , घन, त्रिभुज, वृत्त, क्षेत्रफल, गोल आदिक पर विचार किया गया है।

३३ वर्ष की अल्पावस्था में श्रीनिवास रामानुजन् ने गणित-विश्व को चार हज़ार से अधिक मौलिक प्रमेय दिये हैं।

(‘भारतीय विज्ञानी और उनकी देन’ ; पुस्तक-लेखक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय’ से साभार।)