अब ‘नोट’ के बदले ‘वोट’ की राजनीति करनेवालों की ख़ैर नहीं

४ मार्च, २०२४ ई० को देश के शीर्षस्थ न्यायालय उच्चतम न्यायालय के सात सदस्यों की संवैधानिक पीठ के न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से जो निर्णय किया है, वह देश की संदूषित और विकृत राजनीतिक चरित्र के गालों पर ज़ोरदार तमाचा है।
समय की माँग को समझते हुए, मनबढ़ और बेलगाम होती जा रही भारतीय राजनीति की नकेल कसना बहुत ज़रूरी हो गया है, जिसे देश की शीर्षस्थ न्यायपालिका ने दिखा दिया है।

न्यायालय की ओर से साफ़ कर दिया गया है कि यदि कोई भी विधायक वा सांसद रिश्वत लेकर सदन मे मतदान वा प्रश्न करता है तो उसे अब ‘विशेषाधिकार’ के अन्तर्गत मुक़द्दमे से छूट नहीं मिलेगी। इस प्रकार न्यायतन्त्र ने २५ वर्षों-पहले के अधिकार को पलटते हुए, राष्ट्रहित मे अपना संवैधानिक प्रभाव प्रदर्शित कर यह सुस्पष्ट कर दिया है कि ‘न्याय’ से बढ़कर कोई नहीं।

ज्ञातव्य है कि प्रधान न्यायाधीश डी० वाइ० चन्द्रचूड़, न्यायाधीश ए० एस० बोपन्ना, एम० एम० सुन्दरेश, पी० एस० नरसिम्हा, जे० बी० पारदीवाला, संजय कुमार तथा मनोज मिश्र की संवैधानिक पीठ की ओर से साफ़-साफ़ शब्दों मे कहा गया है– हम वर्ष १९९८ मे ‘पी० वी० नरसिम्हा राव बनाम भारतीय गणराज्य’ मुक़द्दमे मे किये गये उस निर्णय से सहमत नहीं हैं, जिसमे रिश्वत लेकर विधायकों और सांसदों को सदन मे मतदान करने वा भाषण करने के लिए आज़ादी दी गयी थी। विधायक वा सांसद रिश्वत लेकर संसदीय विशेषाधिकार का दावा नहीं कर सकते; उन्हें मुक़द्दमा का सामना करना ही पड़ेगा। अगर विधायक रिश्वत लेकर राज्यसभा मे मतदान करते हैं तब उन पर ‘प्रीवेंशन ऑव़ करप्शन एक्ट’ के अन्तर्गत मुक़द्दमा चलाया जा सकता है।

स्मरणीय है कि उस समय पाँच न्यायाधीशों की संविधानपीठ ने ३:२ के बहुमत से निर्णय करते हुए कहा था– संसद् वा विधानमण्डल मे कोई भी सांसद वा विधायक जो कहते हैं वा करते हैं, उसे लेकर उनपर किसी भी प्रकार का मुक़द्दमा नहीं चलाया जा सकता। दूसरी ओर, ४ मार्च, २०२४ ई० को भारतीय लोकतन्त्र के हित मे संविधानपीठ की ओर से कहा गया था– हम नरसिम्हा राव फैसले से असहमत हैं और उस फ़ैसले को ख़ारिज़ करते हैं, जिसमे कहा गया था कि रिश्वत लेने के मुआमले मे सांसद वा विधायक अपने विशेषाधिकार का दावा कर सकते हैं। कोई अकेला विधायक वा सांसद इस तरह के विशेषाधिकार का उपयोग नहीं कर सकता; विशेषाधिकार पूरे सदन को सामूहिक रूप से दिया जा सकता है। नरसिम्हा राव के प्रकरण मे किया गया निर्णय संविधान के अनुच्छेदों १०५ (२) और १९४ का अन्तर्विरोधी है।

अब यदि रिश्वत लेकर सदन मे मतदान किया गया वा भाषण वा प्रश्न किया गया तो विधायकों वा सांसदों के विरुद्ध मुक़द्दमा किया जायेगा। यहाँ संविधानपीठ की नवीनतम तीन टिप्पणियों पर ध्यान करना आवश्यक है :–
(१) यदि कोई रिश्वत लेता हो तो तभी उसके विरुद्ध प्रकरण बन जाता है। यह मायने नहीं रखता कि उसने बाद मे प्रश्न किया वा भाषण किया कि नहीं। जैसे ही सांसद वा विधायक रिश्वत लेता है वैसे ही उसके विरुद्ध आरोप बन जाता है।
(२) विधायकों वा सांसदों का भ्रष्टाचार और रिश्वतख़ोरी मे लिप्त होना, भारतीय संसदीय लोकतन्त्र की नीवँ को शिथिल करता है। यह एक ऐसा राजनीतिक वातावरण तैयार करता है, जो एक उत्तरदायी लोकतन्त्र से वंचित रखता है।
(३) संविधान के अनुच्छेद १०५ (२) और १९४ सदन के भीतर बहस और विचार-विमर्श के वातावरण को स्वस्थ बनाये रखने के लिए है। इन दोनो अनुच्छेदों का उद्देश्य तब अर्थहीन हो जाता है जब कोई सदस्य रिश्वत लेकर सदन मे मतदान करने वा विशेष रूप से भाषण करने के लिए प्रेरित होता है। वैसी स्थिति मे, किसी भी सदस्य को अनुच्छेद १०५ (२) वा १९४ के अन्तर्गत रिश्वतख़ोरी के लिए किसी भी प्रकार की छूट नहीं दी जा सकती।
(४) रिश्वत लेना, एक आपराधिक कृत्य है। ऐसा कृत्य करनेवाला सदस्य मतदान वा भाषण करने का अधिकार खो देता है। सांसदों का भ्रष्टाचार और रिश्वतख़ोरी सार्वजनिक जीवन मे उसकी सत्यनिष्ठा को नष्ट कर देती हैं। हमारा मत है कि संसदीय विशेषाधिकारों के अन्तर्गत रिश्वतख़ोरी को संरक्षण प्राप्त नहीं है।

शीर्षस्थ न्यायपालिका का यह निर्णय अकस्मात् प्रकाश मे नहीं आया है। वास्तव मे, इसके पीछे ‘झारखण्ड मुक्ति मोर्चा’ के सांसदों का वर्ष १९९३ का वह ‘रिश्वतकाण्ड’ है, जिसमे वर्ष १९९३ मे उक्त राजनैतिक दल के सांसदों ने तत्कालीन नरसिम्हा राव-सरकार का समर्थन करने के लिए मतदान किया था, जिसका अपने निर्णय मे वर्ष १९९८ मे पाँच न्यायाधीशों की संविधानपीठ ने उस कदाचार के पक्ष मे निर्णय किया था, जबकि न्याय की दृष्टि से ऐतिहासिक दिनांक ४ फ़रवरी, २०२४ ई० को सात न्यायाधीशों की संविधानपीठ ने २५ वर्षों-बाद उक्त पक्षपातपूर्ण निर्णय को पलटते हुए, भारतीय लोकतन्त्र को सुदृढ़ करनेवाले निर्णय को सार्वजनिक किया है।
इस समूचे प्रकरण को समझने के लिए हमे वर्ष १९९१ से १९९३ तक के उस राजनैतिक परिदृश्य के साथ जुड़ना होगा, जिसमे राजीव गांधी की हत्या के पश्चात् वर्ष १९९१ का लोकसभा-चुनाव कराया गया था, जिसमे नरसिम्हा राव का प्रधानमन्त्री के रूप मे चयन किया गया था। उन दिनो नरसिम्हा राव के सम्मुख आर्थिक संकट-सहित कई चुनौतियाँ थीं। उन्होंने अर्थव्यवस्था का उदारीकरण करके काफ़ी हद तक देश को संकट से उबार लिया था; परन्तु भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व मे जो रामजन्मभूमि-आन्दोलन अपने चरम पर था, वह नरसिम्हा राव के लिए संकट का कारण बनने लगा था। यही विषय था, जो नरसिम्हा राव के विरुद्ध अविश्वास-प्रस्ताव का कारण बना था; फलत: २६ जुलाई, १९९३ ई० को मानसून-सत्र मे भारतीय कम्युनिष्ट (मार्क्सवादी) पार्टी के अजॉय मुखोपाध्याय ने नरसिम्हा राव के विरुद्ध यह कहकर– सरकार साम्प्रदायिक ताक़तों के प्रति समझौतावादी रवैये अपना रही है, इसलिए अयोध्या की घटना हुई। ये सरकार संविधान मे दी गयी धर्मनिरपेक्षता को बचाने मे विफल हो रही है। अयोध्या मे मन्दिर के विध्वंस के लिए उत्तरदायी जन को सज़ा नहीं देने मे सरकार विफल सिद्ध हुई है।–
अविश्वास-प्रस्ताव प्रस्तुत किया था।

तब लोकसभा मे ५२८ सीटें हुआ करती थीं, जिनमे से भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के पास २५१ सीटें थीं तथा सरकार को बचाने के लिए उसे १३ और सीटों की आवश्यकता थी। उस अविश्वास-प्रस्ताव पर तीन दिनों तक चर्चा होती रही।

२८ जुलाई को अविश्वास-प्रस्ताव पर मतदान कराया गया था, जिसमे प्रस्ताव के समर्थन मे २५१ और विरोध मे २६५ मत पड़े थे। इसप्रकार नरसिम्हा राव-सरकार ने १४ मतों से उस प्रस्ताव को गिरा दिया था। अब ग़ौर करने का विषय है कि उस अविश्वास प्रस्ताव के विफल सिद्ध होने के ३ वर्षों-बाद उक्त प्रकार के रिश्वतकाण्ड को विपक्षियों ने हवा देनी शुरू कर दी थी। राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के सदस्य रवीन्द्र कुमार ने १ फ़रवरी, १९९६ ई० को केन्द्रीय जाँच ब्यूरो के पास एक शिकायती पत्र भेजा था, जिसमे आरोप लगाया गया था कि जुलाई, १९९३ ई० मे एक ‘आपराधिक साज़िश’ के अन्तर्गत नरसिम्हा राव, कैप्टन सतीश शर्मा, अजीत सिंह, भजन लाल, वी० सी० शुक्ला, आर० के० धवन तथा ललित सूरी ने राजनैतिक दलों के सांसदों को रिश्वत देकर सरकार के लिए बहुमत साबित करने का आपराधिक कृत्य किया था, जिसके लिए ३ करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि और आपराधिक साज़िश के लिए १.१० करोड़ रुपये की राशि सूरज मण्डल को दी गयी थी। सी० बी० आइ० की ओर से झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सांसदों :– सूरज मण्डल, शिबु सोरेन, साइमन मराण्डी तथा शैलेन्द्र महतो के नाम सम्मिलित थे। सी० बी० आइ० ने जाँचोपरान्त रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जिसमे कहा गया था– झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के नेताओं ने अविश्वास-प्रस्ताव के विरोध मे मतदान करने के लिए रिश्वत ली है तथा उनके मत और कुछ अन्य सांसदों के मत के कारण नरसिम्हा राव की सरकार गिरने से बच पायी थी।

प्रकरण जब उच्चतम न्यायालय मे पहुँचाया गया तब पाँच न्यायाधीशों की एक संविधानपीठ ने अपने निर्णय मे कहा था– सांसदों ने रिश्वत लेकर एक सरकार बचायी है; लेकिन वे उस सुरक्षा के अधिकारी हैं, जो उन्हें संविधान-द्वारा प्रदत्त है। हमारे आक्रोश की भावना के कारण हमे संविधान की संकीर्ण व्याख्या नहीं करनी चाहिए, जिससे संसदीय भागीदारी और बहस की सुरक्षा की गारण्टी पर असर पड़े।

इसप्रकार उस निर्णय ने आरोपित रिश्वतख़ोर सांसदों को बचा लिया था और नरसिम्हा राव की सरकार को भी।
अब एक अन्य रिश्वत-प्रकरण को तब गति मिली है जब झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख शिबु सोरेन की बहू और विधायक सीता सोरेन ने अपने विरुद्ध प्रसारित आपराधिक काररवाई को निरस्त करने के लिए याचिका प्रस्तुत की थी। उन पर आरोप था कि उन्होंने वर्ष २०१२ मे झारखण्ड-राज्यसभा-चुनाव मे एक निर्दलीय प्रत्याशी-विशेष के पक्ष मे मतदान करने के लिए रिश्वत ली थी। सीता सोरेन ने अपनी उक्त याचिका मे अपने बचाव मे तर्क दिया था कि उन्हें सदन मे मे ‘कुछ कहने’ वा ‘मतदान करने के लिए’ संविधान के अनुच्छेद १९४ के अन्तर्गत छूट प्राप्त है।

प्रधान न्यायाधीश डी० वाइ० चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता मे गठित सात सदस्यीय संविधानपीठ ने ५ अक्तूबर, २०२३ ई० को इस प्रकरण पर अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया था। उस समय अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल तथा इस प्रकरण मे न्यायालय सहायक न्यायमित्र पी० एस० पटवालिया-सहित कई अधिक्ताओं-द्वारा की गयी दो दिनो की बहस के बाद निर्णय सुरक्षित किया गया था।

उच्चतम न्यायालय ने अपने संवैधानिक अधिकार का लोकतन्त्र के हित मे जो प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है, वह स्वागतयोग्य है।

हमे नही भूलना चाहिए कि उच्चतम न्यायालय की ओर से १५ फ़रवरी, २०२४ ई० को ६ वर्ष पहले के ‘इलेक्टोरल बॉण्ड स्कीम’ पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गयी थी। उच्चतम न्यायालय ने उस बॉण्ड-योजना को अवैध ठहराया था। उच्चतम न्यायालय की ओर से कहा गया था कि बॉण्ड-योजना ‘सूचना के अधिकार’ का उल्लंघन है। उसकी गोपनीयता बनाये रखना, संवैधानिक नहीं है।

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