कल (२१ फरवरी) एक ऐसी उत्सवधर्मिता का साक्षी बनना, मेरे लिए गर्व और गौरवपूर्ण था, जिसमें अपने एक शिष्य का बौद्धिक धरातल नितान्त उन्नत लक्षित हो रहा था। इतना ही नहीं, उस जन्मभूमि की माटी के प्रति अभिभूत करनेवाली वह भावना-संवेदना का प्रत्यक्षीकरण एक अनुकरणीय-अनुसरणीय निदर्शन था।
स्थान है, जौनपुर-जनपद का एक सामान्य गाँव ‘बिजेठुआ महाबीरन’ जहाँ शिक्षा-दीक्षा के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं है; परन्तु २१ फ़रवरी को मैंने अपने एक सजग और जागरूक शिष्य प्रियवर हरिश्चन्द्र पाण्डेय जी के श्रमसाध्य-कष्टसाध्य तथा मूल्यसाध्य भाव के परिणाम-प्रभावस्वरूप मुक्तांगन में जिस सारस्वत अनुष्ठान को सम्पूर्ण होता पाया, वह मेरे-जैसे गुरु के लिए एक प्रकार की ‘गुरुदक्षिणा’ ही है। उन्होंने अपने ही गाँव में अपने क्षेत्र (खेत) को एक ऐसा स्वरूप दे दिया है, जहाँ उस गाँव और आस-पास के शिशु, बालिका-बाल, किशोरी-किशोर तथा तरुणी-तरुण अत्याधुनिक शिक्षापद्धति के माध्यम से शिक्षा-प्रशिक्षा अर्जित कर सकते हैं।
‘दी चाइल्ड वर्ल्ड स्कूल’ के माध्यम से गाँव के बच्चों को शिक्षा के एक अभिनव अनुभव से सम्बद्ध कर उन्हें उन बच्चों के समकक्ष ला खड़ा करना उद्देश्य है, जो गाँव के शैक्षिक धरातल को हीन भावना से आज भी देखते हैं।
इस अनुष्ठान को एक शैक्षिक स्वरूप देने में मेरे प्रियवर अनुज और वरिष्ठ सम्पादक डॉ० अरुण पाण्डेय जी की विशेष भूमिका रही है। यही कारण है कि उक्त आयोजन को किसी भी राजनीतिक व्यक्ति से परे रखा गया था। उस सामान्य गाँव में अवध विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ० मनोज दीक्षित जी (मुख्य अतिथि), डॉ० गिरीशचन्द्र त्रिपाठी जी, अध्यक्ष : उत्तरप्रदेश उच्च शिक्षा समिति (सम्मानित अतिथि) कर्नल हर्ष कुमार जी, सचिव : एन०सी०ई०आर०टी० राष्ट्रीय समिति, (विशिष्ट अतिथि), प्रो० सेन पाठक जी (विशिष्ट अतिथि), (राष्ट्रीय विज्ञानी), पद्मश्री डॉ० राजेन्द्र के० ग्रोवर (कैंसर-विज्ञानी), डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, भाषाविद्-समीक्षक (अध्यक्ष) आदिक मंच की शोभा बने रहे।
उल्लेखनीय है कि सजग शिष्य हरिश्चन्द्र जी के श्रद्धेया मातुश्री कंचन पाण्डेय जी पिताश्री तीर्थराज पाण्डेय जी उनकी सहधर्मिणी, उनके भ्रातृवृन्द, पुत्र-पुत्री की इस सारस्वत यात्रा में विशिष्ट सहयात्री की भूमिका रही है।
प्राय: देखा गया है कि लोग गाँव से शहर की ओर पलायन करते हैं; परन्तु यहाँ एक पृथक् ही चित्र दिखता है। प्रियवर शिष्य हरिश्चन्द्र जी का राजधानी दिल्ली में भी एक शिक्षामन्दिर है, जहाँ मुझे वहाँ के अध्यापकवृन्द के साथ संक्षिप्त शैक्षणिक संवाद करने का सुअवसर भी मिला था। उसे एक सुदृढ़ आधार देने के बाद वे अपने गाँव की लौटे हैं और उस गाँव में एक आदर्श शिक्षालय की स्थापना कर, अपने पुरुषार्थ को प्रस्तुत कर दिया है।
उस अवसर पर ग्रामीण इतने उत्फुल्ल थे और स्वयं को इतना गौरवान्वित होते अनुभव कर रहे थे, जिसे शब्दों में बाँध पाना सहज नहीं; वह तो मात्र ‘अनुभूति’ का विषय था।
मेरे लिए वह क्षण अवर्णनीय रहा, जब अधिकारी, अध्यापक आदिक मेरे चरण-संस्पर्श करते रहे और मैं इच्छुक और उत्सुक रहते हुए भी उनका परिचय पूछने का साहस नहीं कर पा रहा था; क्योंकि ‘श्रद्धा’ और ‘विश्वास’ प्रश्न और तर्क से परे हैं। हाँ, शब्दशक्ति की उपयोगिता और महत्ता स्वयंसिद्ध होती रही; गुरु अपरिचय की स्थिति में भी आशीर्वचन देने की भूमिका में बना रहा, मानो द्रोणाचार्य ‘एकलव्य’ की विद्या और उसके संस्कार के सम्मुख सम्मोहित हो रहे हों।
मेरे प्रियवर शिष्य हरिश्चन्द्र पाण्डेय जी सारस्वत पथ पर अग्रसर रहें, कामना है और आशीर्वचन भी।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ फ़रवरी, २०२० ईसवी)