डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला में जानिए ‘आरम्भ-प्रारम्भ-समारम्भ-परिरम्भ’

● शब्द-परिशीलन

किसी भी कार्य की प्रथम अवस्था का अनुष्ठान अथवा सम्पादन ‘आरम्भ’ है। दूसरे शब्दों में— कोई भी कार्य जब पहली बार किया जाता है तब उसे ‘आरम्भ’ कहा जाता है।

अब ‘आरम्भ’ शब्द-संरचना पर हम विचार करते हैं। ‘आरम्भ’ शब्द में ‘आ’ उपसर्ग है, जिसका अर्थ है, ‘अभिविधि’, ‘पर्यन्त’, ‘अवधि’ आदिक। ‘रम्भ्’ शब्द का अर्थ ‘शब्द’, ‘नाद’ (ध्वनि) है। ‘आरम्भ’ शब्द में दो प्रत्यय : ‘घञ्’ और ‘मुम्’ लगे हुए हैं।

अधिकतर अध्यापक और विद्यार्थी ‘आरम्भ’, ‘प्रारम्भ’ तथा ‘समारम्भ’ में अन्तर समझ नहीं पाते हैं और अनुपयुक्त प्रयोग कर देते हैं। यहाँ इन तीनों शब्दों में मात्र उपसर्गों का खेल है। आरम्भ में ‘आ’, प्रारम्भ में ‘प्र’ तथा समारम्भ में ‘सं’ उपसर्ग लगे हैं। ‘आ’ का अर्थ ऊपर बता दिया गया है। ‘प्र’ का अर्थ ‘प्रकृष्ट’ है और ‘सं’ का अर्थ ‘सम्यक्’; अर्थात् प्रकृष्ट (शुद्धता और विधि-विधान के साथ) रूप में और सम्यक् (सुन्दरता के साथ, सम्यक् दृष्टि का परिचय देते हुए, देख-भालकर) रूप में किये गये कार्य क्रमशः ‘प्रारम्भ’ और ‘समारम्भ’ कहलाते हैं।

‘परिरम्भ’ गाढ़े (प्रबल) आलिङ्गन करने की क्रिया है। आपको जब कोई अपनी ओर भीचकर गले लगाता है तब उसे ‘परिरम्भ’ कहते हैं। इसमें ‘परि’ (चारों ओर) उपसर्ग में ‘रभ्’ धातु है, जिसका अर्थ ‘मलना’ है। इसमें ‘घञ्’ और ‘मुम्’ प्रत्यय है, जिनके संयोग होते ही ‘रम्भ’ की ध्वनि आती है और पूर्ण शब्द के रूप में ‘परिरम्भ’ की व्युत्पत्ति होती है। इस प्रकार इसका अर्थ है : बहुविध/ प्रगाढ़ता के साथ/ भीचकर आलिङ्गन करना।

विशेष :—
आरम्भ में रम्भ (रम्भते रागमूर्च्छनादिकमनेनेति)। आरम्भ में ‘रम्भ्’ है और परिरम्भ में ‘रभ्’ है, जिनका पृथक्-पृथक् अर्थ पाने के लिए मूल वैयाकरण ने ‘रम्भ’ और ‘रभ्’ का प्रयोग किया है। अरबी में ज़लील है और जलील भी। पहले में नुक़्त: का प्रयोग है और दूसरे में नहीं। दोनों के अर्थ में बहुत अधिक का अन्तर है। यहाँ ‘रम्भ्’ है और ‘रभ’ भी; दोनों के प्रयोग में पर्याप्त अन्तर है। पहले में अनुनासिक का प्रयोग है और दूसरे में नहीं। ये अन्तर क्यों हैं? यह प्रश्न उसी तरह है जिस तरह आपसे कोई प्रश्न करे : वह रोती क्यों है? और वह रोता क्यों है? जबकि दोनों में ‘वह’ कर्त्ता का ही प्रयोग है। आप पुंल्लिङ्ग-स्त्रीलिङ्ग का नियम बतायेंगे, फिर प्रश्न-प्रतिप्रश्न, उत्तर-प्रत्युत्तर आयेंगे; परन्तु व्युत्पत्तिगत अन्तर के प्रश्न बने रहेंगे। हमारे मूल व्याकरण ने जो उत्पत्ति बतायी है और जो सर्वमान्य है, उनके प्रति ‘अतिरिक्त’ जिज्ञासा हो तो शोधकर्म का आश्रय लेना होगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज ; २३ फरवरी, २०२० ईसवी)