ग़ज़ल – ऐ मेरे ज़मीर! उठ

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


बरबादी लाने को बैठा, देश में शैतान है,
इन्सां क्या, भगवान् भी, हरदम परेशान है।
नीति कुछ, नीयत कुछ, कर्त्तव्य भी अलग,
उसकी ही दुनिया में, शौकत और शान है।
सबक़ सिखायें कैसे, उस बाज़ीगर को हम,
हम तो उसके सारे दाँव-पेंच से अनजान हैं।
हर रस्सी को वह, बाख़ूबी साँप बना लेता है,
तभी तो ज़माना उसको, मानता महान् है।
ऐ मेरे ज़मीर! उठ, अब तू सो लिया बहुत,
तीर शब्दों की चला, कट जाये नाक-कान है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ८ जनवरी, २०१८ ईसवी)