मणि सत्यनारायण तिवारी –
आज जो लिख रहा हूँ उसे पढ़ने के बाद बहुत लोग आसानी से मुझे अपने द्वारा बांटी गयी दो श्रेणियों में से एक श्रेणी का घोषित कर देंगे । महाराष्ट्र में हुई हिंसा को लोग दलित हिंसा कह रहे हैं । नहीं साहब ये कोई दलित हिंसा नहीं थी, ये उस सोच की हिंसा थी जो अंग्रेजों को अपना उद्धारक मानती है ।
बताइए आजाद भारत में कोई अंग्रेजों की जीत की बरसी मनाता है , क्या यह गाँधी जी का अपमान नहीं है ? अरे आपके इस आंग्ल विजय की बरसी में तो भगवान बिरसा मुंडा (जो आदिवासी समाज से आते हैं) का भी अपमान है, जो अंग्रेजों से लड़ते हुए केवल अमर ही नहीं हुए बल्कि आमजन के व देशभक्तों के भगवान बन गए । मित्रों माफ़ करियेगा गाँधी भी केवल महात्मा से ही संबोधित होते हैं, पर मुझे गर्व है आदिवासी समूह से आने वाले पूज्य क्रान्तिकारी बिरसा मुंडा को भगवान कह संबोधित करते हैं । अफसोस कुछ लोग ऐसे क्रांतिकारियों का अपमान कर अंग्रेजों की विजय बरसी मना रहे हैं । आप इस बरसी को दलितों से जोड़कर हमारे पूज्य दलित क्रान्तिकारी तिलका मांझी , सिद्धु संथाल , गोची मांझी, चेतराम जाटव, बल्लू मेहतर, वीरांगना झलकारी बाई, मेंकुलाल, नेता जी के साथ की चमार रेजीमेंट के वीरों का अपमान कर रहे हैं, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बड़े वीरता से युद्ध किया । मैं लिखकर दे सकता हूँ कि जो स्वयंभू दलित नेता हैं उन्होंने इन क्रांतिकारियों का कभी नाम भी नहीं सुना होगा । अरे आपको दलित उत्सव आदि ही मनाना था तो आप कभी और मना लेते । डॉक्टर आंबेडकर की जयंती पर मना लेते ,भगवान बिरसा के अवतरण दिवस पर मना लेते । पर यह अंग्रेज विजय दिवस पर ही क्यों ? अगर अंग्रेज दलित समर्थक थे तो बताएं कितने दलितों को अंग्रेजों ने अपने शासन के समय उच्च प्रशासनिक पद दिये या आप बताएं अंग्रेजों ने दलितों के लिए दलित उत्पीङन कानून क्यों नहीं बनाया । अगर उन्हें दलितों की चिंता थी तो अंग्रेजों ने बाबा साहब को पढने में मदद क्यों नहीं की ? मित्रों मेरे दलित भाइयों का प्रयोग तब अंग्रेजों ने किया और अब मेवाणी जैसे लोग कर रहे हैं । आप ही बताएं उस हिंसा के बाद वहां उमर खालिद पहुँच गया, यह वही उमर खालिद है जो अफजल की बरसी मनाता है । अर्थ साफ है मेरे मित्रों पहले अफज़ल की बरसी फिर अंग्रजों के विजय की बरसी । सच कहूँ तो ये मेरे ये भोले दलित भाई तो बस हथियार हैं, इसके पीछे तो देश को तोड़़नेे की बहुत सुनियोजित साजिश है । हम आम लोगों के अन्दर एक दूसरे के लिए कोई नफरत नहीं है । पर देश विरोधी ताकतें अभी देश में अस्थिरता लाने के लिए दोनों ही पक्षों के कुछ लोगों को खरीदकर हमारे बीच नफरत बोने का काम कर रही हैं । आप खुद ही देख लीजिये इस हिंसा में किसका फायदा हुआ । उसे ही न जिसे कल तक कोई पूछता नहीं था और आज वो हर न्यूज के लाइव डिबेट में आ रहा है । कोई खुद को खुद से एक समुदाय का नेता बताता है तो कोई दूसरे समुदाय का । अब आपको चुनना है कि आप अंग्रेजों की विजय बरसी मनाएंगे या भगवान बिरसा मुंडा का अवतरण दिवस ।