डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
भारत के प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी ओमान के ‘स्पोर्ट्स काॅम्पलेक्स’ में एक घण्टा छ: मिनट तक वहाँ के लोग और आप्रवासी भारतीयजन के सम्मुख भाषण करते रहे। अफ़सोस! नरेन्द्र मोदी भूल गये थे कि भारत का एक प्रधान मन्त्री विदेश में सम्बोधन कर रहा था। कैसे? इसे समझिए। नरेन्द्र मोदी ने कहा था :——
१- भारत में ‘अब’ एक-दो दिनों में ‘पासपोर्ट’ बन जाता है।
२- पहले देश में हर दिन करोड़ों के घोटाले पर हल्ला होता था।
३- ३००-३५० रुपये का एलईडी बल्ब ‘अब’ ४०-५० रुपये में मिलता है।
४- डायरेक्ट ट्रांसफर से मैंने ग़रीबों का ५७ हज़ार करोड़ रुपये बचाया है। पहले ये रकम बिचौलिये को जाता था।
५- ३ लाख ५० हज़ार फ़र्ज़ी कम्पनियों को सरकार बन्द कर चुकी है।
६- भ्रष्टाचार और काले धन से लड़ाई जारी रहेगी।
७- पहले लोग पूछते थे : कितना गया; आज पूछते हैं : कितना आया?
८- देश में विश्वास जो पैदा हुआ है, वह नयी आशा को जन्म दिया है।
९- भाषण के बाद मैं ओमान के सुलतान से मिलने जाऊँगा।
— नरेन्द्र मोदी ने और भी कई आपत्तिजनक बातें कही थीं।
मोदी के कथन की समीक्षा :—–
१- भारत का ऐसा कौन-सा नागरिक है, जिसका ‘पासपोर्ट’ एक से दो दिनों में बन जाता है। मैंने स्वयं ‘पारपत्र’ (पासपोर्ट) के नवीनीकरण के लिए ‘ऑन लाइन’ आवेदन किया था; महीनों हो गये, अभी तक कोई अभिक्रिया प्राप्त नहीं हुई है। नरेन्द्र मोदी एक प्रधान मन्त्री होकर इतना बड़ा झूठ बोलने का कैसे दुस्साहस कर पा रहे हैं, अत्यन्त आश्चर्य होता है।
२- नरेन्द्र मोदी अपने गिरेबाँ में कब झाँकेंगे? नोटबन्दी के समय महेश शाह ने जो तथ्य उद्घाटित किये थे, उसे क्यों झुठलाया गया? मध्यप्रदेश का ‘व्यापमं’ घोटाला, बिहार में भा०ज०पा० नेताओं-द्वारा किया गया ‘भूखण्डक्रय’ घोटाला, ‘अमित शाह के बेटे जय शाह’ का घोटाला, ‘राफेल’ घोटाला आदिक कई घोटालों पर जब आवाज़ उठायी गयी थी तब मोदी कहाँ थे? ‘नोटबन्दी’ के बाद अब तक कुल कितने रुपये भारतीय रिजर्व बैंक में आये हैं, क्यों नहीं सार्वजनिक किया गया है? ‘रोड शो’ आदिक के नाम पर देश की जनता के कितने रुपये अपव्यय किये गये हैं? कौन जवाब देगा?
३- मोदी जी बतायेंगे : देश के किस स्थान की किस दूकान में ४०-५० रुपये में एलईडी बल्ब बेचे जा रहे हैं? मैंने लगभग १० दिनों पूर्व २८० रुपये के हिसाब से तीन बल्ब भी लिये थे, जिसका कैशमेमो भी दूकानदार ने ‘जी०एस०टी०’ का भय दिखाकर नहीं दिया था। मेरे दबाव डालने पर अपनी दूकान के ‘विजिटिंग कार्ड’ पर लिखकर दे दिया था।
देश का कोई भी व्यक्ति बतायेगा : क्या मोदी के शासनकाल में ४०-५० रुपये में एलईडी बल्ब मिलता है? यदि मिलता भी है तो कहाँ और किस प्रकार का बल्ब मिलता है?
४- ग़रीबों के ५७ हज़ार करोड़ रुपये बचाये हैं तो वे रुपये कहाँ गये? कितने ग़रीबों के खाते में वे रुपये जमा कराये गये हैं?
५- जिन ३ लाख ५० हज़ार फ़र्ज़ी कम्पनियों को सरकार बन्द कर चुकी है, उन्हें सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? क्या इस समय देश में फ़र्ज़ी कम्पनियाँ नहीं चलायी जा रही हैं अथवा सरकार उनकी अनदेखी कर रही है?
६- घोषणा के स्वर में नरेन्द्र मोदी ने पूर्ववर्ती सरकारों को धिक्कारते हुए, अपनी सरकार बनने के १०० दिनों के भीतर विदेश से काला धन लाने का वादा किया था परन्तु अफ़सोस! वादा ‘जुम्ला’ बनकर रह गया है। नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार और काले धन से कितनी और कैसी लड़ाई लड़ रहे हैं, सप्रमाण प्रस्तुत करना चाहेंगे? बिहार के ‘सृजनकाण्ड’ भ्रष्टाचार की अनदेखी क्यों की जा रही है, इसलिए कि उसमें किसी-न-किसी रूप में उनके सहयोगी नीतीश कुमार भी फँसते नज़र आ रहे हैं।
७- सच यह है कि आज सम्पूर्ण देश में वर्तमान शासन की बेहद घटिया आर्थिक नीति के चलते देश की जनता महँगाई की चक्की में इतनी पिसती जा रही है कि वह जान नहीं पाती : कितना आया। जो कुछ उसने बचाकर रखा था, सब चला गया; चला जा रहा है।
आज देश में समानान्तर अर्थव्यवस्था संचालित की जा रही है; सरकार ‘कारपोरेट घरानों’ की गोद में बैठी हुई है। मध्यम-वर्ग का ख़ून चूसा जा रहा है, जिसके मूल में मोदी-सरकार की जनविरोधी नीतियाँ हैं। “सबका साथ-सबका विकास” एक नारा तक ही सीमित है; सच यह है, वर्तमान सरकार शीर्षस्थ उद्योगपतियों के अकूत कर माफ़ कर चुके हैं और सामान्य वर्ग को अपनी अनुभवहीन आर्थिक समझ की चक्की में पीसते जा रहे हैं। वहीं बिचौलिये देश के राजस्व को घुन की तरह से खाये जा रहे हैं और अब तक का सर्वाधिक असफल वित्तमन्त्री अरुण जेतली असहाय होकर टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं।
८- देश में चमचों का विश्वास पैदा हो रहा है; जनसामान्य का विश्वास यह सरकार खो चुकी है। उसका विश्वास जुम्लेबाज़ों की ओर से बिखरता जा रहा है।
९- अपने भाषण के दौरान नरेन्द्र मोदी ने कहा था : भाषण के बाद मैं ओमान के सुलतान से मिलने जाऊँगा परन्तु अफ़सोस! भाषण समाप्त करने के तुरन्त बाद भारत के प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी सर्कस के किसी विदूषक किरदार की तरह से एक स्कूटरनुमा वाहन पर किनारे की ओर खड़े होकर हाथ हिलाते हुए, उस स्टेडियम का चक्कर लगाते दिख रहे थे। उस कथित वाहन को एक व्यक्ति चला रहा था। तथाकथित ‘रोडशो’ की बीमारी से ग्रस्त नरेन्द्र मोदी की उस गतिविधि को देखकर किसी भी स्वाभिमानी भारतीय का सिर लज्जा के साथ झुक जाता। वह दृश्य इतना बीभत्स था कि कहीं से नहीं लग रहा था कि महान् भारत का एक प्रधान मन्त्री ऐसा भी कर सकता है। वह दृश्य वैसा ही था, जैसे किसी खेल का खिलाड़ी कोई प्रतियोगिता जीतने के बाद स्टेडियम का चक्कर लगा रहा हो। वैसा आचरण एक खिलाड़ी को शोभा दे सकता है परन्तु किसी देश के शासनाध्यक्ष के लिए वैसा आचरण किसी भी स्तर पर शोभनीय नहीं था।
ज्ञातव्य है कि जब किसी देश का कोई भी राजनीतिक व्यक्ति विदेश में जाता है तब मात्र अपने कूटनीतिक वैदेशिक सम्बन्धों की बात करता है, न कि हमने ये किया, हमने वो किया; पिछली सरकारों से हमने बेहतर किया; पिछली सरकारों ने देश में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया और हमने स्वर्ग बना दिया। प्रश्न है, तुमने यदि किया तो देश पर कौन-सा एहसान किया है। तुम्हें हमने इसीलिए चुना कि तुम बेहतर करोगे; पिछली सरकारों से हटकर लोकमंगलकारी कार्य करके दिखाओगे किन्तु तुमने तो चरितार्थ कर दिखाया : “बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ सुभान अल्ला।”
एक मायने में भारत का प्रधान मन्त्री ओमान में नहीं बोल रहा था बल्कि भारत के एक प्रमुख राजनीतिक दल का एक ‘प्रवक्ता’ बोल रहा था।
देश की आर्थिक स्थिति कितनी दुरवस्था को प्राप्त कर चुकी है; बजट से जनसामान्य का जीवन कितना अस्त-व्यस्त कर दिया गया है; देश में साम्प्रदायिकता की आग की लपटें विदेशों में इतनी भयावह दिखायी दे रही हैं कि कोई विदेशी कम्पनी भारत में निवेश करने के लिए हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। यही कारण है कि नरेन्द्र मोदी इस देश से उस देश में घूम-घूमकर प्रचार कर रहे हैं कि भारत में बाज़ार है। आओ! और निवेश करो।
नोटबन्दी, जी०एस०टी० के दुष्प्रभाव के कारण लघु और मध्यम व्यापारी, उद्यमी त्रस्त हो चुके हैं; कल-कारख़ानों के बन्द हो जाने से अब तक हज़ारों कर्मचारी बेरोज़गार हो चुके हैं; सरकार की सामर्थ्य इतनी खोखली हो चुकी है कि रोज़गार की लगभग सारी सम्भावनाएँ क्षीण हो चुकी हैं। देश की सामाजिक स्थिति इतनी शोचनीय हो गयी है कि एक व्यक्ति तक सुरक्षित नहीं है। “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” का नारा देनेवाला इस यथार्थ से आँखें मूँदे हुए है कि आयेदिन बेटियों का शीलहरण किया जा रहा है; अमानवीय यातनाएँ दी जा रही हैं; जो जैसा चाहता है, उनके साथ व्यवहार करके बच निकलता है; उनकी नृशंस हत्याएँ की जा रही हैं। सरकार ने महँगाई की आग में घर-परिवार को इतना झुलसा दिया है कि बेटियों को पढ़ाने के लिए औसत भारतीय के पास रुपये तक नहीं है। सुव्यवस्थित शिक्षणसंस्थान तक नहीं हैं।
हमारे अन्नदाता कहलानेवाले किसानों के साथ स्वयं नरेन्द्र मोदी ने कितना घिनौना खेल खेला है, यह किसी से छुपा तक नहीं है। किसानों की लागत का डेढ़गुना-दोगुना दिलाने की बात सार्वजनिक मंच से करनेवाले मोदी अपना वादा कैसे भूल गये हैं? ऋणमाफ़ी की बात करनेवाले मिथ्यावादी कैसे निकल गये?
आज देश का शिक्षित युवा-वर्ग बेरोज़गारी का दंश झेलते-झेलते तन-मन से प्रौढ़ और वृद्ध दिखने लगा है; शासकीय नीति और नीयत के दो पाटों के बीच उसे ऐसा फँसा दिया गया है कि वह ‘किंकर्त्तव्यविमूढ़’ दिख रहा है; कितने ऐसे हैं, जिनके माँ-बाप जगह-ज़मीन बन्धक रखकर, बेचकर अपनी सन्तान के सुनहरे भविष्य की आशा में उन्हें पढ़ा-लिखा रहे हैं परन्तु रिश्वतख़ोरी, अपारदर्शी शिक्षा, परीक्षा, सेवानीति के चलते उनकी गति-प्रगति वहीं-की-वहीं ठहरकर रह गयी है, परिणामस्वरूप अपराध, देशद्रोह, फिरौती, सुपारी लेकर हत्या, अपहरण, मानव-तस्करी, स्मगलिंग इत्यादिक नाना प्रकार के अपराधों में बढ़ोत्तरी होती जा रही है।
देश के सैनिकों की आयेदिन पाकिस्तानी आतंकवादी, फ़ौजी हत्याएँ कर रहे हैं और मोदी-सरकार ‘शहीद’ का दर्ज़ा देकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ले रही है। नरेन्द्र मोदी ने ही वर्ष २०१४ के लोकसभा-चुनाव के दौरान गर्जना करते हुए और मनमोहन सिंह को बुरी तरह से धिक्कारते हुए कहा था : मेरी सरकार बनेगी तो मैं एक के बदले ग्यारह सिर लाऊँगा। नरेन्द्र मोदी के शासनकाल के लगभग चार वर्ष होने को हैं। वे बता सकते हैं : अब तक कुल कितने सिर लाये हैं?
कितनी शर्म की बात है कि मोदी की ही एक सहयोगी संस्था ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ के मुखिया का यह कथन हमारे देश के उन वीर सेनानियों के शौर्य को चुनौती दे रहा है, जिनके सामने कथित संघ की शक्ति ‘नगण्य’ है। संघ के प्रधान मोहन भागवत ने यह कहने का दुस्साहस कैसे किया : सेना को तैयार करने में छ: माह का समय लग सकता है, जबकि हम स्वयंसेवक की सेना को तीन दिनों में तैयार कर देंगे? इस पर नरेन्द्र मोदी चुप्पी क्यों साधे हुए हैं?
कच्चे तेल की क़ीमत बहुत घट गयी है परन्तु पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस की क़ीमतें क्यों बढ़ती जा रही हैं? देशवासियों को खुले रूप में मूर्ख बनाते हुए ‘वन नेशन- वन टैक्स’ के नाम पर जिस जी०एस०टी० को लागू किया गया है, उसमें पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस को क्यों नहीं शामिल किया गया है? जी०एस०टी० (वस्तु सेवा कर) को जितने स्तर पर बाँटा गया है, क्या उसे ‘वन नेशन-वन टैक्स’ कहना तर्कस़गत है?
चिकित्सा-सुविधा, दवाइयाँ और जाँच-सुविधा निश्शुल्क देने के नाम पर सरकारी हस्पताल दोनों हाथों से आम जनता को जिस तरह से लूट रहे हैं, उसके प्रति वर्तमान सरकार जागरूक है?
शौचालय-सुविधा के नाम पर गाँवों में जिस तरह से शौचालय बनवाये जा रहे हैं, उनकी गन्दगी की निकासी की व्यवस्था कथित मोदी-सरकार या फिर उसके ब्राण्ड एम्बेस्डर अमिताभ बच्चन कैसे करेंगे, करायेंगे, इसके लिए भी तो उपाय बतायें। एक दिन ऐसा आयेगा, जब सारा गाँव मैले के टीले के रूप में दिखेगा।
भाषणबाज़ी तब अच्छी लगती है जब उसके अन्तर्गत आनेवाले तथ्य आचरण में भी उतारे जायें। खोखला चरित्र देखकर आईना चिटक जाता है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १२ फ़रवरी, २०१८ ई०)