कूड़े वाला आदमी

 प्रभाँशु कुमार-


वह आदमी
निराश नही है
अपनी जिन्दगी से
जो सड़क के किनारे लगे
कूड़े को उठाता हुआ
अपनी प्यासी आँखो से
कुछ ढूंढ़ता हुआ
फिर सड़क पर चलते
हंसते खिलखिलाते
धूल उड़ाते लोगों को टकटकी
बांधे देखता
फिर कुछ सोचकर
अपनी नजरे
दुबारा अपने काम पर टिका लेता
शायद ये
सब मेरे लिए नहीं
वह सोचता है
आखिर कमल को हर बार
कचरा क्यों मिलता है
वह आदमी
दौड़ के उस कूढे को उठाता
जैसे उसे ईश्वर का प्रसाद मिल गया हो
जैसे तालाब के किनारे
कमल खिल गया हो
फिर सड़क पर लोग नहीं है
प्लास्टिक के थैले नहीं है
आैर चल देता है
दूसरे कूड़े के ढेर की आेर
शायद अपनी किस्मत को कोसते हुए
बस यही है मेरी जिन्दगी ।।


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