डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला : एक

आरती :– यह स्त्रीलिंग शब्द है, जिसका अर्थ है, किसी मूर्ति के चारों ओर सामने से दीपक को घुमाना। आरती किसी व्यक्ति -विशेष की नहीं की जाती प्रत्युत देवि-देव-विशेष की जाती है |
शुद्ध अर्थात् तत्सम् शब्द है, ‘आरात्रिका’। इसी से तद्भव शब्द ‘आरती’ का सर्जन हुआ है, जिसे लोक-भाषा (बोली) ने अंगीकार कर लिया है; वहीं लोक-भाषा का कोई सर्व-सम्मत व्याकरण नहीं है अतः स्थानिक भाषा होने के कारण उस पर किसी भी प्रकार के व्याकरण की वर्जना नहीं है।
अब ‘आरती’ के मूल शब्द ‘आरात्रिका’ पर विचार करते हैं :———–
आरात्रिका’ शब्द में ‘आ’ उपसर्ग है, जिसका अर्थ है– अभिविधि, पर्यन्त, अवधि आदिक। ‘रात्रि’ शब्द स्त्रीलिंग संज्ञा है, जो ‘रा’ (देना) धातु में ‘क्विप’ प्रत्यय के संयोग से अस्तित्व में आया है। रात्रि+का = रात्रिका।


(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; २२ फरवरी, २०१८ ईसवी; अपराह्न ६.५०)
(यायावर भाषक-संख्या : ९९१९०२३८७०)