जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद)

क्या रखा है वेद ऋचाओं में,
सब छिपा है रक्त शिराओं में।
बाँहें फड़कें , भुज दण्ड उठे,
क्या रखा है, कृत्रिम आभाओं में।
क्या रखा……………………… .
स्पन्दित हृदय भी सिहर उठे,
दोलायमान हो वसुन्धरा ।
कुक्कुर -सा न तू पुच्छ हिला,
केहरि गर्जन तेरा है क्यों ठहरा?
निरपेक्ष बने रहने में है क्या?
क्या रखा है जड़ हुई भुजाओं में?
क्या रखा है…………………
तुम मर्त्यलोक के अधिवासी,
भावुकता का परित्याग करो।
जीवन के चरण चक्र तोड़ो,
परिवर्तन का सिंहनाद करो।
मर्यादा की जकड़न खोलो,
क्या रखा है, घुटती आशाओं में।
क्या रखा है……………………
विधि-नियम-नीति जब तब बदली,
युग परिवर्तन की अब बारी है।
भाव -भंगिमा रहे अब वीरोचित,
यह खबर नहीं अखबारी है।
अच्छा है शिलाखण्ड बनना,
क्या रखा है, निर्वीर्य सभाओं में।
क्या रखा है……………………..