पत्रकारिता ‘मौज-मस्ती’ नहीं, ‘साधना’ है

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

कहाँ से शुरू करूँ? यह प्रश्न स्वाभाविक है; क्योंकि मैं ‘नख-शिख’ स्वयं में ‘पत्रकारिता’ हूँ। तीन अंकों में भी अर्जन किया और पाँच अंकों में भी। इन्हीं तीन और पाँच के बीच जिस-जिस समाचारपत्र और पत्रिका से जुड़ा, उस-उसमें बड़े-बड़े लबादा ओढ़े स्वत्वाधिकारियों और सम्पादकों को ”तीन-पाँच” करते हुए देखा है।
विडम्बना ही रही है कि जब-जब समाचारपत्र और पत्रिकाओं का सम्पादक रहा तब-तब स्वत्वाधिकारियों से टकराता रहा; बिचौलियों और तथाकथित सहयोगी सम्पादकों (महिला-पुरुष) की आँखों की किरकिरी बना रहा; क्योंकि उनका भ्रम मिटाता रहा— पत्रकारिता ‘मौज-मस्ती’ नहीं, ‘साधना’ है!

पहले सुना और देखा करता था कि यदि किसी को कहीं-कोई नौकरी नहीं मिलती थी तो वह ‘स्कूल-मास्टर’ बन जाया करता था; दूसरी ओर, आज यह समय-सत्य है कि किसी को कोई नौकरी नहीं मिलती है तो वह कम-से-कम ‘पत्रकार’ बन जाता है। यह विचारणीय पक्ष है। यहीं पर ‘आज पत्रकारिता दुरवस्था में क्यों?’ समाज यह प्रश्न करने की स्थिति में आ जाता है। आज पत्रकारिता अधिकतर भागों में ख़रीद-फ़रोख़्त की ‘इक चीज़’-सी बनकर रह गयी है!..?

वहीं इसका एक अन्य पक्ष भी है कि अपने देश में ऐसे भी पत्रकार हैं, जो सम्पादन के शीर्ष पर रहते हुए, अपनी शालीनता, सदाशयता, सौजन्य तथा अर्थगर्भिता के साथ पत्रकारिता के मूल के साथ सम्पृक्त होकर, उसे पूर्णत: आत्मसात कर वर्तमान परिवर्त्तन के साथ भी ‘सन्तुलन’ बनाये हुए हैं और यही नीति आधारमूलक पत्रकारिता की क्षति होने से रक्षा कर रही है। समय ऐसे सामर्थ्यवान् सारस्वत सन्तानों का समादर करता आया है।

हमारे देश का पत्रकार समाचारपत्र-कार्यालय में पूर्वाह्न ११ से मध्याह्न १२ के लगभग आता है। सम्पादकीय बैठक में भाग लेता है और उचित दिशा-निर्देश पा घर लौट आता है। वह अपने समय पर पुन: कार्यालय जाता है; लाये और दिये हुए समाचारों को प्रकाशन-योग्य बनाता है और रात में १०-११ के लगभग घर लौटता है। महीना समाप्त होने पर उसके हक़ में ५ से १० हज़ार रुपये आते हैं। बड़े समाचारपत्रों में योग्यता और पद की गम्भीरता के आधार पर वेतन का निर्धारण होता है। ऐसे पत्रकारों का वर्ग अपनी व्यथाकथा, शोषणकथा कहने से समाचारपत्रों में प्रकाशित करने-कराने का साहस नहीं कर सकता और समाज की गन्दगी को सीना तानकर प्रकाशित करता है। यह विषय भी विचारणीय बन जाता है। बड़े समाचारपत्रों के साथ जुड़े जो क्षेत्रीय पत्रकार होते हैं, उनमें से अधिकतर आपको तहसील, कचहरी, थाना, ब्लॉक, ग्रामप्रधान-कार्यालय आदिक स्थानों में ‘रंगदारी’ झाड़ते मिल जायेंगे। वास्तव में, ऐसे पत्रकारों को ‘पत्रकारिता के ककहरे’ की भी समझ नहीं होती। यही कारण है कि समाचारपत्र-कार्यालयों में जो क्षेत्रीय समाचारों को तैयार कर उन्हें प्रकाशन के योग्य बनाता है, उसे बहुत जूझना पड़ता है। पहले उसे ‘डाक समाचार’ कहा जाता था। अब स्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं।

अब जहाँ तक पत्रकारिता के पठन-पाठन का विषय है, अधिकतर पत्रकारीय शिक्षण-संस्थानों, विश्वविद्यालयीय पत्रकारिता जनसंचारविभागों की स्थिति अतीव दयनीय और शोचनीय है। अध्यापक ही अपने मूल दायित्वों का सम्यक् रूपेण निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं; उन्हें ही निर्धारित पाठ्यक्रम की समझ नहीं है। ऐसे में, जब बीज ही विकृत है और धरती ही बन्ध्या है तो फल की आशा कैसी?..!
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ३ जून, २०१८ ई०)