डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
‘नोट-परिवर्त्तन’ (नोटबन्दी), ‘जी०एस०टी०’, ‘अघोषित मूल्यवृद्धि’ आदिक कृत्यों के परिणाम देश के सम्मुख नकारात्मक रूप में आ चुके हैं। जो भी लाभ मिला, वह सरकार के राजस्व के पक्ष में रहा और देश-नेतृत्व निरंकुश बना रहा; परन्तु यह निश्चित है कि बी०जे०पी० को उसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी। दूसरी ओर, देश का विपक्ष नितान्त शिथिल है। सबसे पहले काँग्रेसियों को अब तक चली आ रही ‘परिवारवादी गांधी-परम्परा’ के खोल से बाहर आना होगा; क्योंकि काँग्रेस को उसी परिवारवाद ने ‘निराधार’ बना रखा है। काँग्रेस के सोच पर तरस आता है। वह पिछले चार वर्षों में यह तय नहीं कर पायी है कि वर्तमान सरकार को अगले चुनावों में किन-किन विषयों पर किस प्रकार से घेरेगी। ऐसे में, उसका राजनीतिक चरित्र सन्दिग्ध दिखता है। महँगाई प्रतिदिन जिस गति में बढ़ती जा रही है, उसके प्रति काँग्रेस और अन्य विपक्षी दल कान में तेल डाले सोये हुए हैं।
समाजवाद और लोहिया के नाम पर अब तक ठगी करनेवाले चेहरों पर चढ़े नक़ाबों को उखाड़ फेंकना होगा। साम्यवाद के नाम पर ‘आत्मवाद’ की ओछी राजनीति करनेवालों को दर-किनार करके राष्ट्रवादी चिन्तकों को राजनीति में लाना होगा। ‘दलित’ शब्द के नाम पर निहायत गर्हित राजनीति करनेवाली/ वालों को अपदस्थ कर, समदर्शितापूर्ण आचरण प्रस्तुत करना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो सामान्य जन को वर्तमान सत्ताधारियों के विरुद्ध ‘क्रान्ति’ का बिगुल बजाने के लिए तत्पर रहना होगा।
बी०जे०पी० की नीति अब सुस्पष्ट हो चुकी है :— ग़रीब की कमर तोड़ दो; मध्यम-वर्ग को आपस में बाँट दो, ताकि सत्ता के विरोध में उनके स्वर उठ न सकें; हिन्दू-मुसलिम धर्म का विकृत रूप उपस्थित कर दो, ताकि दोनों आपस में लड़ते-कटते-मरते रहें। दलित जाति को अन्य जातियों के समकक्ष ला दो, ताकि वे आपस में संघर्षण करते रहें और उसका लाभ सरकार को मिलता रहे। वर्तमान सरकार की सुस्पष्ट नीति है कि समाज में इतना विघटन कर दो और उसे इतना निरुपाय कर दो कि सत्ताधारियों की निरंकुशता वह सहन करने के लिए विवश बना रहे और सत्ताधारी दोनों हाथों से उसका दोहन करते रहें।
औद्योगिक वर्ग को प्रोत्साहन देनेवाली वर्तमान सरकार कृषक-वर्ग के लिए नितान्त अहितकर सिद्ध हो रही है। इस सरकार ने सभी नियमों को ताक़ पर रखकर देश के शीर्षस्थ उद्योगपतियों को ऋण देकर अपनी मंशा ज़ाहिर कर दी है कि वह धनपशुओं के हाथों खेल रही है। यही कारण है कि देश का वह वर्ग, जो ज़रूरतमन्द है और आर्थिक सहायता अथवा ऋण से अपनी स्थिति सुधारना चाहता है, उसके सामने सरकार स्वयं को ‘भिखारी’ के रूप में प्रस्तुत करती आ रही है। देश की वर्तमान आर्थिक स्थिति देश के करोड़ों अनियोजित युवाओं के भविष्य को नष्ट कर रही है; आयात-निर्यात की नीतियों में असमानता स्पष्टत: दृष्टिगोचर हो रही है तथा महँगाई थमने का नाम नहीं ले रही है। समानान्तर अर्थव्यवस्था (काला धन) का वर्तमान सरकार वैधानिक रूप में पोषण कर रही है। सरकार बनने के १०० दिनों के भीतर ताल ठोंककर विदेशों से काला धन लाने की बात करनेवाले की सरकार बन चुकी है; उसके बाद भी वह मौन बना हुआ है, जो निर्लज्जता की पराकाष्ठा है।
सच तो यह है कि वर्तमान सरकार की राष्ट्रघाती आर्थिक नीतियों से देश के करोड़ों युवा बेरोज़गार बुरी तरह से आहत हैं; संघटित-असंघटित क्षेत्रों में रोज़गार की कहीं-कोई सम्भावना नहीं दिख रही है। लघु और मध्यम स्तर के उद्योग दम तोड़ रहे हैं; निजी क्षेत्रों से लाखों लोग बेरोज़गाररहित किये जा चुके हैं। केन्द्र-सरकार की सेवा-नीतियों से सुस्पष्ट हो चुका है कि उसके पास नौकरी नहीं है; पिछले चार वर्षों में बेरोज़गारी की स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो चुकी है।
आज भारत और प्रत्येक भारतवासी ‘वर्ल्ड बैंक’ का कितना क़र्ज़दार है, सरकार आँकड़ा जारी करे। तथाकथित नोटबन्दी के बाद से सरकार को कितनी आय हुई है, इसे सरकार आज तक नहीं बता पायी है। ऐसा इसलिए कि उसकी नीयत की खोट देश-ज़ाहिर हो चुकी है। ‘अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष’ से भारत की सरकार ने अपने देशवासियों की आर्थिक उन्नति के लिए अब तक कितनी सहायता-राशि, अनुदानराशि, ऋणराशि इत्यादिक ली है, इसे उजागर करे।
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी अब तक लगभग ७० देशों की यात्राएँ कर चुके हैं। उन यात्राओं में अब तक कितने अरब रुपये अथवा जो भी धनराशि व्यय की गयी है, उसे सार्वजनिक करें; क्योंकि इसे प्रत्येक भारतवासी को जानने का हक़ है। सरकार की योजनाओं के औचित्यविहीन विज्ञापनों में देश की जनता की कितनी धनराशि का अपव्यय किया है, उसे सरकार उजागर करे।
वर्तमान सरकार देश और देशवासियों का आर्थिक दोहन करने में लगी हुई है, जो देश को आर्थिक ग़ुलामी की ओर ले जाने का एक षड्यन्त्र के रूप में दिख रहा है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ३ जुलाई, २०१८ ई०)