डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
एक :
भाषा बदरंग
शैली मलंग,
प्रस्तुति
बहकने लगी।
दो :
आँधी-तूफ़ान
कहीं कोई
अप्रिय घटना नहीं;
असहयोग आन्दोलन है।
तीन :
कथ्य निहत्था
तथ्य बेसुरे
हँसुए के ब्याह में
खुरपे का गीत।
चार :
प्रतीक सजीला
बिम्ब रंगीला
अभिव्यक्ति
सरकने लगी।
पाँच :
वर्तनी अकेली
सौन्दर्यबोध लजीला
अभिव्यक्ति
दरकने लगी।
छ: :
काग़ज़ की नाव
बारिश की छाँव
छतरी भीजे-न-भीजे
सूरज तनहाई में।
सात :
आँखों-की खटास
कोई आस-न-पास
रिश्तों के नाम,
काले ख़ुतूत।
आठ :
महकी अमराई
चहका यौवन।
आग लग गयी
पानी में।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ३ जुलाई, २०१८ ईसवी)