हरदोई के लोगों से अटल जी का रहा है गहरा नाता, सण्डीला तहसील क्षेत्र रही है कर्मभूमि

  • वर्ष 1945 में प्रचारक के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने संडीला में पूरे क्षेत्र का भ्रमण किया और संगठन को किया सुदृढ
  • बुखार होने के बावजूद हरदोई के सण्डीला में लिखी थी  ‘अमर आग’ नामक कविता
  • शादियों में भी आशीर्वाद पत्र भेजकर अपना स्नेह दिखाते रहे थे अटल जी
  • पूरे जिले के विभिन्न लोगों से रहा है पारिवारिक वातावरण जैसा रिश्ता


            हरदोई– पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का हरदोई से बहुुुत गहरा नाता रहा है और सण्डीला से अधिक ख़ास । क्योंकि सण्डीला जितना देश में लड्डुओं के मशहूर हैैै उतना ही अटल बिहारी बाजपेयी जी केे लगाव के लिए भी। यह उनकी कर्मभूमि रही । लोगों के साथ उनका पारिवारिक रिश्ता भी बन गया।
             अटल जी के बारे में बताते हुए उनके साथी भावुक हो जाते है। संडीला में राष्ट्रीय स्वयं सेवक के प्रचारक के रूप में न केवल कार्य किया था बल्कि नवयुवकों को जोड़ने के लिए क्रांतिकारी रहे साहित्यकार बचनेश त्रिपाठी के साथ अटल जी गांव गांव भ्रमण करते थे और करीब दो वर्ष में उन्होंने भ्रमण कर घर घर आरएसएस की विचारधारा को पहुंचाया था। अटल जी ने कैसे रिश्ते निभाये हैं उसका उदाहरण है बघौली थाना क्षेत्र के महरी निवासी स्वर्गीय चंद्रभाल अवस्थी जी । जिनके पुत्र सुधीर अवस्थी के 2007 में वैवाहिक कार्यक्रम के बाद अटल जी का वरवधू को आशीर्वाद देने का पत्र भी आया जिसको आज भी सम्भाल कर रखा गया है।
             वर्ष 1945 में प्रचारक के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संडीला में पूरे क्षेत्र का भ्रमण किया तथा संगठन को सुदृढ़ करने के साथ ही नवयुवकों को जाग्रत करने का भी कार्य किया जिससे उन्हें काफी लोकप्रियता मिली। संघ के तत्कालीन विभाग प्रचारक पं. दीनदयाल उपाध्याय व जिला प्रचारक केशव बालकृष्ण जोशी के जाने के बाद अटल जी को यहां प्रचारक की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। लाला लक्ष्मण प्रसाद कपूर के धर्मशाला में संघ का कार्यालय संचालित था तथा उसके बाहर मैदान में शाखा लगती थी। अटल जी इसी धर्मशाला की कोठरी में रहते थे। बताते हैं कि स्व. रामनाथ मेहरोत्रा, विश्वनाथ मेहरोत्रा के अलावा कई अन्य लोगों के घर से बारी बारी से अटल बिहारी वाजपेयी के लिए भोजन आया करता था।
           स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पत्रकार रहे बचनेश त्रिपाठी बताया करते थे कि उन दिनों अटल जी का जीवन सादगी पूर्ण था। जब वह यहां आकर रुके थे तो उनके पास दो लुंगी, खाकी निक्कर, बनियान व पैजामा ही था। बताते हैं कि एक दिन उन्हें कछौना जाने के लिए धोती की जरूरत पड़ी तब बचनेश जी पड़ोस की एक दुकान से धोती मांग लाए, लेकिन जब धोती को खोला गया तो उसमें छेद ही छेद निकले। ऐसी स्थिति में उन्हें निक्कर पहन कर ही कछौना जाना पड़ा। अटल जी की यादों के बारे में बताया जाता है कि एक दिन जब वह ज्वर में बड़बड़ा रहे थे तो पता चला कि वह कविता की रचना कर रहे थे। उस समय लिखी गई यह कविता उन्होंने बचनेश जी को सुनाई जिसका शीर्षक था ‘अमर आग’। जब वह यहां संघ शाखा का संचालन कर रहे थे तब भाऊराव देवरस व बाबा साहब आप्टे जैसे संघ के कर्मठ व प्रमुख नायक आए किंतु अटल जी ने अपने व्यक्तित्व की जो छाप छोड़ी उसे यहां के लोग कभी भुला नहीं सकेंगे।