एक अभिव्यक्ति : भाषा ले रसगागरी

डॉ०पृथ्वीनाथ पाण्डेय


भाषा ले रसगागरी, चली पिया के देश।
अगवानी में लिपि रही, मन्त्रमुग्ध परिवेश।।
सौम्य कविता-कामिनी, ले रचना परिधान।
उपमा, अद्भुत, सोरठा, सबका है सम्मान।।
वहीं समीक्षा बैठकर, रहि माथा खुजलाय।
कैसे-कैसे कवि यहाँ, करनी कही न जाय।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १३ अक्तूबर, २०१८ ईसवी)