ऐ मेरे ज़मीर! उठ!

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

घर-घर मे हर जगह दिखता अब शैतान है,
इन्साँ क्या, भगवान् भी उससे परेशान है।
नीति कुछ, नीयत कुछ, नज़रीय: भी अलग,
ऐसों की दुनिया मे ही शौकत और शान है।
सबक़ कैसे सिखायें ऐसे शातिरों को हम,
हम तो उनके सारे दाँव-पेंच से अनजान हैं।
रस्सी को वे बाख़ूबी साँप बनाने मे हैं माहिर,
तभी तो ज़माना उनको अब मानता महान् है।
ऐ मेरे ज़मीर! उठ! भोर की लाली पुकारती,
शब्द-बाण चला कि कट जाये नाक-कान है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; ८ जनवरी, २०२२ ईसवी।)