क्या सम्भव है धराधाम से राम उठाने आएँगे?

जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद)

बिन सोने की लङ्का का ग़र मैं रावण बन जाऊँ तो;
क्या सम्भव है धराधाम से राम उठाने आएँगे?
ख़ुद तम्बू में रह करके जो भक्तों से न रुष्ट हुये;
आगे  करके  सत्ता  पाने  वालों से  संतुष्ट हुये।
घर से बेघर हो करके जो न्याय प्राप्ति को भटक रहा;
दूजे के दुःख हरने वाला दुःख के आँसू गटक रहा।
साकेतपुरी के राजा पर संकट भारी है गहराया;
क्या इंद्रप्रस्थ के धर्मराज अब धर्म बचाने आएँगे?
क्या सम्भव है धराधाम से राम उठाने आएँगे?
पद-स्पर्श मात्र से जिसने पाषाण अहिल्या तारी थी;
एक  नहीं  जिसके  त्रेता  में  तीन-तीन महतारी थीं।
प्रजा की लघुता दरकिनार कर त्याग दिया था प्राणप्रिया;
वनवासी-सा जीवन जीते , भनक किसी को नहीं दिया।
कलियुग में जन-गण ने पहुँचाया न्यायालय के द्वार पे;
क्या न्यायपीठ पे बैठ चन्द्रगुप्त न्याय दिलाने आएँगे?
क्या सम्भव है धराधाम से राम उठाने आएँगे?
अञ्जनी-तनय जिनके चरणों के युगों- युगों से दास रहे;
भक्त विभीषण ने भ्रातृ-द्रोह के अपयश का संताप सहे।
प्रेम मात्र  के  भूखे  प्रभु  ने  शबरी  के  जूठे फल खाये;
विशिख-मात्र  से  पुरुषोत्तम  ने थे सहस्र अरिदल  ढाये।
सत्ता  पा   फ़िर  भक्त  आज  सुग्रीव -सा  मदमत्त हुए;
क्या  फ़िर  लक्ष्मण  राजमोह  से  नहीं  जगाने आएँगे?
क्या सम्भव है धराधाम से राम उठाने आएँगे?