‘बिना रीढ़ की हड्डी का’ दिखते देश के बुद्धिजीवी-वर्ग और राजनीतिक विपक्षी दल

सच तो यह है कि अब बुद्धिजीवी रह कहाँ गये हैं; अब तो 'अवसरजीवी' यत्र-तत्र-सर्वत्र मुँह मारते हुए दिख रहे हैं।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

देश की लोकघाती सरकार आर्थिक नीतियों को लागू कर विविध क्षेत्रों में मूल्य-वृद्धि करती जा रही है। पेट्रोल-डीजल, गैस चावल-दाल-गेहूँ, दूध, तेल-घी, सब्ज़ी अधिक के मूल्य आसमान छू रहे हैं; रुपये का लज्जाजनक अवमूल्यन हो चुका है; घृणा और असमानता का वातावरण चरम पर है; भारतीय संविधान, न्यायालयों तथा सुरक्षातन्त्रों पर सरकारी चेहरों का कुत्सित वर्चस्व सुस्पष्ट दिख रहा है; परन्तु अपने अधिकार की बातें करनेवाले लोग अपने-अपने घर में घुसे हुए हैं; इस गम्भीर विषय के प्रति सबकी आँखें मूँदी हुई हैं, जबकि निजी सन्दर्भों में खुल जाती हैं। भारत में बुद्धिजीवियों का एक ऐसा वर्ग है, जो मात्र ‘भाषणबाज़ी’ में अव्वल दिखता है; स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, हिजड़ा-विमर्श आदिक विमर्श पर वह धारदार विचार करेगा; परन्तु केन्द्र-राज्यसरकारों की नाकामियों पर उसके साथ संवाद करने पर उसे साँप सूँघ जाता है।

सच तो यह है कि अब बुद्धिजीवी रह कहाँ गये हैं; अब तो ‘अवसरजीवी’ यत्र-तत्र-सर्वत्र मुँह मारते हुए दिख रहे हैं। सरकारें पुरस्कार, नियुक्ति, मनोनयन आदिक के टुकड़े फेंककर उन्हें अपने पाले में खींच लेती हैं। ऐसे में, कथित अवसरवादी टुकड़ख़ोरों को राष्ट्रवाद की मूल धारा में लाना “लोहे के चने चबाना”-जैसा है। यदि लाये भी गये तो क्या पता कब पीठ में छुरी भोंककर चलते बनें। ऐसी स्थिति में, उनसे किसी भी प्रकार की उम्मीद करनी नासमझी कही जायेगी।

दूसरी ओर, देश का कर्त्तव्यविहीन लुण्ठित विपक्षी दल लोकतन्त्र का जनाज़ा उठाने में इन सरकारों की जाने-अनजाने मदद करते आ रहे हैं । सरकारें जनाक्रोशित करनेवाले ऐसे-ऐसे घिनौने कृत्य करती आ रही हैं, जिनसे विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश कहलानेवाला भारत की मानव-सभ्यता बार-बार पराजित होती आ रही है। तरह-तरह की रीति-नीति बनाकर केन्द्र और राज्य की सरकारें सामाजिक और आर्थिक हैसियत को तार-तार करती आ रही हैं :— राज्यों की सरकारें अपने स्तर और केन्द्र की सरकार अपने स्तर पर।

मध्यमवर्गीय जनता ‘पैर से सिर’ तक भ्रष्टाचार में डूब कर रह गयी है और वही सर्वाधिक असंतुष्ट भी है। ऐसे में, इस दोगली विद्रूपता से कैसे निबटा जा सकता है? इस पर गम्भीर विचार-मन्थन करने की आवश्यकता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ सितम्बर, २०१९ ईसवी)