विचारणीय-शोचनीय : मोदी है तो मुमकिन है?..!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

केन्द्र-राज्य की सरकारों ने देश की जनता की गाढ़ी कमाई को बेहयाई के बेसन में लपेटकर पकौड़ीनुमा निर्दय अर्थव्यवस्था की कूटनीतिभरी बर्बरता की दहकती कड़ाही में तलकर चट करने की नीतियाँ बनाती जा रही हैं और देश की विभाजित जनता तय नहीं कर पा रही है कि प्रतिक्रिया करे अथवा ‘महामानव’, ‘दिव्य पुरुष’ के चरण पखारे। बहरहाल, वह दिन दूर नहीं, जब यही कथित जनता “कौड़ी के तीन” होने वाली है।

कभी-कभी ऐसा लगता है, मुहम्मद तुग़लक, हिटलर, चंगेज़, नादिर आदिक के आत्मा एक साथ ‘परकाया प्रविष्टि’ पद्धति के द्वारा कथित ‘विस्मयकारी व्यक्ति’ की देह में प्रवेश कर गये हैंं। इस देश में ऐसी-ऐसी नीतियाँ बननेवाली हैं कि हम-आप आइसक्रीम अपने हाथों में लिये रहेंगे; किन्तु चूसनेवाला कोई रहेगा; अन्त में, आपके हाथों में सँभली-सुरक्षित, अँगुलियों के अनुलेपन पाती हुई, आइसक्रीम की डण्डी हमारे-आपके मुँह को जीभर चिढ़ाती रहेगी और हम-आप ख़ुद की ‘एकपक्षीय कुत्सित-गर्हित-आत्मकेन्द्रित राजनीतिक मनोवृत्ति को कोसने के अतिरिक्त कुछ भी कर सकने की स्थिति में नहीं रहेंगे। जिस तरह से देश का उधारी संविधान है उसी तरह से अब देश की शासकीय नीतियाँ उधारी ढाँचे पर खड़ी दिखेंगी, इसीलिए ‘सरकार जी’ विदेशों की यात्राएँ कर वहाँ के अप्रासंगिक वातावरण को भारत में थोपकर यहाँ के नागरिकों को उनकी मूलभूत आवश्यकताओं को छीनने की तैयारी कर रहे हैं। नौकरी है नहीं। ऐसा लगता है, कुछ दिनों-बाद नौकरियाँ ‘संविदा के आधार’ पर दी जायेंगी। इसकी शुरुआत कर दी गयी है। एकमुश्त पारिश्रमिक दिया जायेगा। “मरता क्या न करता”। आबादी की ‘हनुमानी पूँछ’ रुकने का नाम नहीं ले रही है।ऐसे में, शर्त्तों पर नौकरियाँ दी जायेंगी और आपराधिक आरोप मढ़कर सेवाएँ समाप्त भी कर दी जायेंगी; क्योंकि बेचैन लोग ‘लाइन’ में लगे दिखेंगे। भुखमरी की स्थिति भारत में दस्तक दे रही है; क्योंकि “मोदी है तो मुमकिन है”।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ सितम्बर, २०१९ ईसवी)