‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
देश के किसी भी सिद्धपीठ मन्दिर के देवी-देव से वरदान माँगने पर यदि उसकी पूर्णता हो जाती तो आज देश में कोई ग़रीब नहीं रहता?
उपर्युक्त प्रश्न समय-सत्य है, न कि धर्म के गर्हित बोध के खन्दक से निकला हुआ एकपक्षीय मान्यता है। विचार इसीलिए मरते जा रहे ह़ै; क्योंकि आचार खोखला होता जा रहा है। जो विषय-विकेन्द्रित वैचारिक नौकाओं पर सवार रहता है, वह स्वयं तो डूबता ही है, जो गन्तव्य तक पहुँचने की आस में बैठे रहते हैं, उन्हें भी जलसमाधि लेने के लिए विवश कर देता है। जब किसी के भीतर सदियों से ठूँसी हुई धर्म की गर्हित अवधारणा प्रबल होती है तब उसके भीतर का ‘लघु मानव’ प्रकट होता है, जो उसकी उस छद्म धर्मान्धता से साक्षात् कराता है, जिससे भक्त बनकर भी उसका समाज त्रस्त है; क्योंकि वह ‘धर्म का मर्म’ समझे बिना धर्म का कर्म करता है। जब अनहितकारी कर्म पर प्रहार होता है तब उससे सम्पृक्त व्यक्तियों के मन-मस्तिष्क के तन्तु टूटने लगते हैं, फिर वह अपने वास्तविक प्रज्ञा से परे रहकर ‘बुद्धिवाद’ और ‘अतिवाद’ का ज्ञान बघारने लगता है। इसमें उसका दोष नहीं है, दोष तो उन संस्कारों का है, जिनकी उपज से समाज आत्मावलम्बी बनने के स्थान पर ‘तथाकथित धर्मावलम्बी’ बनता जा रहा है; धर्म के नाम पर समाज को विषाक्त तो करता ही जा रहा है, उस धर्म के प्रति ‘वितृष्णा’ का भाव भी भरता जा रहा है। ऐसे ही धर्मभीरु जहाँ से चलते हैं, घूम-फिरकर वहीं अटक कर रह जाते हैं; आत्मविकास कर पाते हैं और न ही समाजविकास।
पूजा-पाठ, मन्दिर, मठ आदिक के महत्त्व को तो ‘नारायण’ ही नकार देते हैं, “मद्भक्ता: यत्र गायन्ति तिष्ठामि तत्र नारद।”
आज यह प्रश्न प्रासंगिक है– इस देश में है कोई धर्मावलम्बी, जो अपनी शक्तिपीठ में निहित शक्ति का प्रदर्शन कर-करा सके? निरपराध की हत्या, धर्मशक्ति की परिचायिका नहीं है। यथार्थ के धरातल पर पाँव रखने का अभ्यास करना चाहिए; डगमगाया तो अंग-प्रत्यंग भंग होने में विलम्ब नहीं होता।
प्रकृति (जल-वायु-प्रकाश) से बढ़कर भला कौन शक्तिपीठ है, जिसे हम जीवन्त रूप में हम देखते ह़ै; जिसका हम अनुभव करते हैं तथा जिससे हम ऊर्जा और प्रेरणा ग्रहण करते हैं?
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १४ जून, २०२० ईसवी)