आरती जायसवाल (साहित्यकार, समीक्षक)

इधर भारत में पतञ्जलि ने वैश्विक महामारी ‘कोरोना’ की आयुर्वेदिक औषधि बनाई और उधर हो-हल्ला। हो भी क्यों न? अभी विश्व के वैज्ञानिक/चिकत्सक खोज में लगे हैं और हमारे योग बाबा रामदेव ने उसे बाज़ार में पहुँचाने की घोषणा भी कर दी।
जाँच भी हो रही है और विरोध भी। विरोध करने वाले यह भी भूल गए हैं कि भारत में कोरोना से मृत्युदर विश्व में सबसे कम है। कारण हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता हो या आयुष मन्त्रालय द्वारा बताया गया ‘आयुर्वेदिक काढ़ा’ ।
विचारणीय यह है कि जब हम ‘काढ़े पर विश्वास करके निर्भीक बने ,कोरोना कवच पहने घूम रहे हैं तो आयुर्वेदिक औषधि ‘कोरोनिल’ पर उसी आयुष मन्त्रालय को इतना अविश्वास क्यों?
दवा माफिया कभी नहीं चाहेंगे कि लोग पूर्ण स्वस्थ हों, इसलिये वे विभिन्न दवाएँ लेकर आते रहे हैं और मंत्रालय भी उन एलोपैथी दवाओं को प्रमाणिकता प्रदान करता रहा है । जिनसे एक बीमारी ठीक कराने जाओ तो दस मुफ़्त में मिल जाती है। अनेक उदाहरण है जिसमें एक गलत इन्जेक्शन मनुष्य को लकवाग्रस्त कर देता है, एक गलत औषधि अंगों को काटने पर विवश कर देती है।
मनुष्य का शरीर एक बार गलत डॉक्टर के हाथ में चला जाये तो जीवित बचने की भी सम्भावना समाप्त हो जाती है और सौभाग्य से बच भी गए तो जीवन भर की पीड़ा के साथ चिकत्सालयों के चक्कर। प्रकृति और मानव शरीर दोनों एक-दूसरे के पूरक व सहायक हैं।
आदिकाल से ही प्रकृति और आयुर्वेद पूर्ण रोग निवारण में सहायक हैं। विभिन्न जटिल रोगों के निवारण में भी आयुर्वेद और प्राकृतिक उपचार सफ़ल हुआ है। आयुर्वेद की शक्ति को हम नकार नहीं सकते जो एलोपैथ से होने वाली शारीरिक हानि के भुक्तभोगी हैं वे आयुर्वेद की ओर लौट आये हैं ।
आयुर्वेद की शक्ति को इसलिए भी बढ़ावा नहीं मिलता कि रोग यदि पूरी तरह समाप्त हो गया तो वे डॉक्टर क्या करेंगे जो विभिन्न प्रकार की मँहगी पढ़ाई करके आये हैं, किससे वसूलेंगे ?
‘दवा माफ़िया’ और मंहगे डॉक्टरों का फैला हुआ जाल जो उसमें फँसे बीमार लोग को हर प्रकार से अपने शिकंजे में कसता हुआ घर-द्वार बेचने पर विवश कर देता है , उनके द्वारा किये जा रहे अनेक अनावश्यक तीव्र औषधियों के प्रयोग जो मानव शरीर को सदा के लिए रोगग्रस्त भी बना देता है । वे कभी नहीं चाहेंगे कि जन को कोई भी सस्ती स्वास्थ्य सुविधा अथवा औषधि उपलब्ध हो। किन्तु मेरे विचार में ‘आहार ही उपचार है और प्रकृति सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक है।’ हमारी जीवन शैली के आधार पर भी हम स्वस्थ और अस्वस्थ होते हैं। यदि हम मान भी लें कि ‘कोरोनिल’ कोरोना की प्रमाणिक औषधि नहीं है, तब भी अनेकों रसायनयुक्त, अनुपयोगी औषधियों और अहितकारी मिलावटी पेय/खाद्य पदार्थों को देखते हुए प्राकृतिक संघटकों द्वारा निर्मित इस औषधि के प्रयोग की अनुमति मिलनी चाहिए।