आदित्य त्रिपाठी ( प्रबंध सम्पादक आई.वी.24 न्यूज )

(निदेशक, आईवी २४ न्यूज़)
सत्ता के लिए महाराष्ट्र में रात 1 बजे राष्ट्रपति शासन हट जाता है । सरकार बनाने के लिए रात में कोर्ट भी लग जाती है, आनन-फानन फैसले भी आ जाते हैं, परन्तु पढ़े-लिखे युवा को सारी अर्हता पूरी करने के बाद भी नौकरी पाने में वर्षों लग जाते हैं । कभी सरकारें लेटलतीफी करती हैं तो कभी-कभी नियमों में ऐसे छेद छोड़ दिए जाते हैं कि भर्तियों का मामला कोर्ट चला जाता है और वहाँ वर्षों लम्बित पड़ा रहता है । यदि कोई नेता चुनाव की सारी अर्हताएं पूरी कर विधायक/सांसद/मन्त्री बन जाए परन्तु बाद में कोई कमी पाई जाए तो वह तब तक पद पर बना रहता है जब तक कोर्ट या उससे सम्बन्धित विधानसभा/लोकसभा/राज्यसभा उसे अयोग्य घोषित न कर दे । परन्तु दूसरी ओर नौकरी की उम्मीद संजोए युवाओं द्वारा सारी अर्हताएं पूरी करने के बाद भी वह तब तक योग्य घोषित नहीं होते जब तक कोर्ट का फैसला न आ जाए (अब लगभग सभी मामलों में) । आखिर यह दोगलापन क्यों ? #अच्छेदिनआनेवालेहैं कहकर सत्ता में आने वाली पार्टी के कार्यकाल में युवाओं को रोजगार के लिए सड़क पर उतरना पड़ रहा है; लाठियां खानी पड़ रही हैं, यदि यही अच्छे दिन हैं तो नहीं चाहिए हमें अच्छे दिन ।
लाल-नीली बत्ती उतारकर वी.आई.पी. कल्चर को खत्म करने का दिखावा करने वाले सत्ता-लोलुपों को यह समझना चाहिए कि वी.आई.पी. कल्चर बत्तियां हटाने से नहीं अपने मन में भरे सत्ता के दम्भ को हटाने से खत्म होगा । किसी (वी.आई.पी.) के लिए न्याय तीन दिन में तो किसी (आम आदमी ) के लिए न्याय तीन साल में भी नहीं । यदि कहीं सरकार बनाने-बिगाड़ने की बात हो तो सत्ताधीश तुरन्त सक्रिय हो जाते हैं; परन्तु लाखों युवाओं का भविष्य अन्धकारमय है; किसी को परवाह नहीं । शिक्षा और रोजगार शायद इस सरकार की प्राथमिकता ही नहीं है क्योंकि शिक्षित व्यक्ति सवाल करता है, अन्धानुकरण नहीं ।