निम्नांकित दोहावली भारतेन्दु हरिश्चन्द की प्रसिद्ध कविता ‘निज भाषा’ से उद्धृत की गयी है। हिन्दी के अधिकतर भक्तगण हिन्दी-विषयक आयोजनों में “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा-ज्ञान के मिटत न हिय को सूल।।” को ‘मिटै न हिय को शूल’ लिखते, पढ़ते तथा बोलते हैं।
ज्ञातव्य है कि भारतेन्दु हरिश्चन्द ने इस रचना के अन्तर्गत कुल दस दोहे सम्मिलित किये थे।
यहाँ वे सभी दोहे प्रस्तुत हैं :–
एक–
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
दो–
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।
तीन–
उन्नति पूरी है तबहिं, जब घर उन्नति होय।
निज शरीर उन्नति किए, रहत मूढ़ सब कोय।।
चार–
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्यैहैं सोय।
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।।
पाँच–
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग ।
छ: —
और एक अति लाभ यह, यामे प्रगट लखात,
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ।
सात–
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय,
यह गुन भाषा और महँ, कबहूँ नाहीं होय ।
आठ–
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार,
सब देसन से लै करहुँ, भाषा माहि प्रचार ।
नौ–
भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात,
विविध देस मतहूँ विविध, भाषा विविध लखात ।
दस–
सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय,
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय ।
टिप्पणी– उपर्युक्त रचना में कवि ने जिन अर्थ-अवधारणाओं की सर्वोपरि महत्ता स्थापित की है, उसके मूल में निज भाषा ‘हिन्दी’ है। भारतेन्दु ने पाँचवें दोहे में ‘इक भाषा इक जीव’ कहकर ‘एक राष्ट्र-एक भाषा’ की मान्यता को बल प्रदान किया है।
इस दोहावली में ‘निज भाषा’ का शब्दार्थ और उसकी परिव्याप्ति संलक्षित हो रही है। धन्य हैं, भारतेन्दु और धन्य है, उनका काव्यचिन्तन।
सभी शब्द ‘संधान’ के विषय तो हैं ही, ‘अनुसन्धान’ की सम्भावनाओं से सम्पूर्ण भी।