नरेन्द्र मोदी के ‘प्रधानमन्त्री का राष्ट्र के नाम संदेश’ की समीक्षा

★ समीक्षक– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘न्यू इण्डिया के प्रधानमन्त्री’ ने ७ जून, २०२१ ई० को जिस पराजय-भाव के साथ ‘राष्ट्र के नाम ‘लिखित’ संदेश को पढ़ा था, उससे केवल ‘कोरोना-राग’ की ध्वनि आ रही थी और मोदी-सरकार की अपनी शर्मनाक असफलता को ‘रफू’ करने की असफल कोशिश दिख रही थी। ‘कल के पप्पू’ और ‘आज के अभिमन्यु’ राहुल गांधी और देश के शीर्षस्थ न्यायालय उच्चतम न्यायालय ने ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ से वैक्सिन के लिए बनायी गयी नीति को सार्वजनिक करने की चुनौती दी और सरकार की ‘वैक्सिन-नीति’ को प्रश्नों के कठघरे में ला खड़ा किये थे, उससे परेशान और बाध्य होकर नरेन्द्र मोदी ने एक सस्ता और चतुराईभरा रास्ता निकाल लिया, जो ७ जून को अपराह्न ५ बजकर २ मिनट से ५ बजकर ३२ मिनट तक ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ के रूप में दिखा था। ‘कोविड-१९’ की दोनों लहरों में हमारे करोड़ों देशवासी ऑक्सीजन, वेण्टिलेटर, वैक्सिन तथा अन्य उपकरणों और औषधों के अभाव में मारे गये थे, जबकि नरेन्द्र मोदी मूँछें ऐंठकर मोदी-सरकार-द्वारा
युद्धस्तर पर ऑक्सीजन, वेण्टिलेटर, वैक्सिन आदिक की युद्धस्तर पर व्यवस्था की गयी थी, इसकी वकालत की थी। बेशक, यह मोदी का बचकाना बयान था या फिर हो सकता है, मोदी को ‘युद्धस्तर’ के अर्थ की समझ न हो।

नरेन्द्र मोदी को यह कहते हुए लज्जा नहीं आयी या फिर उनकी जीभ कटकर गिर नहीं गयी थी– “दो गज़ की दूरी-मॉस्क है जरूरी”। देशवासी मोदी से जानना चाहता है, पिछले दो महीनों में जब देश के अनेक राज्यों के चुनावी सभाओं में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की भाषणबाज़ी हो रही थी तब “ढाई गज की दूरी-मॉस्क है जरूरी” का पालन क्यों नहीं कराया गया था? उत्तरप्रदेश के ज़िला-पंचायतचुनावों में लाखों की संख्या “भेड़िया धसान’ का दृश्य था, उसके विरुद्ध नरेन्द्र मोदी की पार्टी की सरकार ने कौन-सा क़दम उठाया था?

नरेन्द्र मोदी ने कहा था, “यदि भारत में बनी वैक्सिन नहीं होती तो भारत-जैसे विशाल देश का क्या होता?” लगता है, मोदी तब अज्ञातवास पर थे। उन्हें मालूम नहीं, केन्द्र और राज्य-सरकारों के पालों में वैक्सिन ‘फुटबॉल’ की तरह से उछलती रही और वैक्सिन के अभाव में लोग पंजीकरण कराने के बाद भी परेशान होते रहे। सरकारी स्वास्थ्य-केन्द्रों और चिकित्सालयों से वैक्सिन ग़ायब थीं और वही निजी चिकित्सालयों में ऊँचे दामों पर बेची जा रही थीं।

मोदी की एक ख़ासियत है; और वह यह कि अपने किसी भी प्रकार के वक्तव्य में ‘पिछले साठ-सत्तर वर्षों में ऐसा हुआ-वैसा नहीं हुआ’ का प्रेतात्मा को बेताल की तरह से कन्धे पर ढोते चले आ रहे हैं, जो कि उनका साथ छोड़ नहीं रहा है, तभी तो अपनी ‘बेईमान नज़रों’ का सहारा लेते हुए अपने संदेश में कहने से बाज़ नहीं आये,”पहले की सरकारों को विदेशों से वैक्सिन लाने में ‘दशकों’ लग जाते थे। पोलियो के वैक्सिन के लिए देश को दशकों तक इन्तजार करना पड़ता था।” उनका यह इशारा सुस्पष्ट रूप से तत्कालीन यू० पी० ए०-सरकार की ओर था। उन्होंने यह भी कहा, “पहले वैक्सिनेशन का कवरेज’ ६० प्रतिशत था, जो पाँच-सात सालों में ९० प्रतिशत हो चुका है। ऐसा मोदी ने किस आधार पर कहा है? मोदी का एक और सफ़ेद झूठ देखें, “हम शतप्रतिशत टीकाकरण की ओर बढ़ ही रहे थे कि कोरोना ने हमें फिर घेर लिया।”

हाँ, नरेन्द्र मोदी का यह कथन सौ प्रतिशत सही है, “नीयत साफ, नीति स्पष्ट तथा निरन्तर प्रयास होते हैं तो सफलता मिलती है।” तभी तो निष्ठाहीन नियति, धुँधली नीति तथा नकारात्मक और शिथिल प्रयास के परिणामस्वरूप देश में प्रतिदिन हज़ारों लोग की मृत्यु हो रही थी। मोदी का कहना था, ”ग़रीबों की हमने सबसे ज्यादा चिन्ता की।” फिर देश के ग़रीब लोग परीक्षण, वेण्टिलेटर, ऑक्सीजन, वैक्सिन आदिक के अभाव में तड़प-तड़प कर क्यों मर गये? उनके घरवालों को शव तक नहीं दिये गये; शवों को गड्ढों, तालाबों, नदियों में फेंक दिये गये; टायर और पेट्रोल की धधकती आग में शव फेंक दिये जाते रहे!

नरेन्द्र मोदी ने कहा, ”वैज्ञानिकों को हज़ारों करोड़ों रुपये अध्ययन, परीक्षणों को करने के लिए दिये गये; उनकी राय मानी गयी।” यदि ऐसा था तो कोविड पर अध्ययन-परीक्षण करने और सरकार से सत्य साक्ष्य माँगने पर सरकार-द्वारा गठित शीर्षस्थ विज्ञानी सलाहकार-मण्डल के चेअरमैन और देश के प्रमुख विषाणुविज्ञानी प्रो० सलीम ने त्यागपत्र क्यों दिया था? अन्य विज्ञानियों में असन्तोष क्यों था? उन्हें सरकार-द्वारा साक्ष्यरहित आँकड़े क्यों दिये जाते रहे?

न्यू इण्डिया का प्रधानमन्त्री कितना झूठा है, उसके इस कथन से सिद्ध हो जाता है, “भारत की तुलना में अन्य देशों में वैक्सिनेशन बहुत कम हुआ है। भारत में वैक्सिनेशन विकसित देशों से भी तेज है।” देशभर में वैक्सिनेशन का काम ‘कछुए’ की गति में क्यों क्यों किया जा रहा है? जब विकसित देश अपने देशों में वैक्सिनेशन कर रहे थे तब न्यू इण्डिया सो क्यों रहा था? इनके जवाब मोदी के पास है नहीं। जब देश को वैक्सिन की ज़रूरत थी तब तो उसे मोदी-सरकार अन्य देशों में भेजवा रही थी, ऐसा क्यों किया गया था?

मोदी ने अपने कथित संदेश में कहा था, “प्रधानमन्त्री गरीब कल्याण योजना’ के अन्तर्गत नवम्बर तक ८० करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन दिया जायेगा।”

यहाँ मोदी से प्रश्न है– कोरोना-काल में जिनकी नौकरियाँ छिन चुकी हैं; जिन्हें अपनी नौकरियाँ करते हुए भी कुछ को आधा वेतन मिल रहा है तो कुछ को ‘कुछ भी’ नहीं मिल रहा है; जिनके माँ-बाप को कोरोना खा चुका है और आय का कोई निश्चित स्रोत नहीं है– इन सभी की आजीविका के लिए कथित सरकार क्या कर रही है? देश का मध्यमवर्ग महँगाई के संकट से संत्रस्त है, उसके कल्याण के लिए मोदी-सरकार ने कौन-सी नीति बनायी है?

अब हम उन विषयों पर विचार करेंगे, जिनका कथित संदेश में ‘न्यू इण्डिया’ के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने एक शब्द नहीं कहा था। कोरोना-काल में जितने लोग मारे गये थे, उन पर मोदी मौन दिखे थे। देश के सरकारी चिकित्सालयों, विशेषत: ग्रामीण प्राथमिक/सामुदायिक स्वास्थ्य-केन्द्रों की दुर्दशा, गंगा और अन्य नदियों में शवप्रवाह, गंगातट पर बालू में शवदफ़्न और शवदहन के लिए व्यवस्था के अभाव, एम्बुलेंस, ऑक्सीजन, वेण्टिलेटर की कुव्यवस्था, नक़्ली वैक्सिनेशन और औषधों, विपदा को अवसर बनाकर लाभ लेना– इन पर मोदी कुछ भी नहीं बोल सके थे।

आज देशवासी मोदी-सरकार की बेहद घटिया और जनघाती आर्थिक नीति से त्रस्त और पस्त हो चुके हैं। ऐतिहासिक वैश्विक विपदा-काल में लगातार पेट्रोल-डीज़ल के दामों में लगातार बढ़ोतरी करवाकर जनसामान्य की बची-खुची ज़िन्दगी को भी मोदी खा जाना चाहता है। खाद्यान्न इतने महँगे कर दिये गये हैं कि देश की जनता यह सोचने के लिए बाध्य हो चुकी है– हम क्या खायें और क्या न खायें। इस महँगाई पर मोदी की ज़बाँ पर ताला लटका दिखा था।

इस आपदा-विपदा को अवसर बनाकर ‘लोकतन्त्र की प्रयोगशाला’ में सियासत प्रयोग करनेवाले नरेन्द्र मोदी की देशघाती नीतियों का कठोर विरोध करने का समय आ चुका है।
अब अप्रमाणित एम० ए० पास नरेन्द्र मोदी ने अपने संदेश में जिन अशुद्ध और अनुपयुक्त शब्दों के प्रयोग किये थे, उनमें से अति सामान्य शब्दों को समझें :–
१- अनेकों बैठकों
२- उद्योग मन इच्छती
एक श्लोक पढ़ते समय ‘इच्छति’ के स्थान पर ‘इच्छती’ का उच्चारण किया था।
३- भारत-सरकार

एक देश के प्रधानमन्त्री को यही मालूम नहीं कि अपने देश के राज्यों के संदर्भ में ‘भारत-सरकार’ के स्थान पर ‘केन्द्र-सरकार’ का प्रयोग किया जाता है, जबकि ‘वैदेशिक संदर्भों में ‘भारत-सरकार’ का व्यवहार किया जाता है। मोदी ने कई स्थलों पर ‘भारत-सरकार’ का प्रयोग किया था। मोदी का एक प्रयोग– भारत-सरकार ने राज्यों को एक गाइड-लाइन बनाकर दी थी।
इस प्रकार मोदी-सरकार पर उच्चतम न्यायालय के न्याय की चाबुक पड़ी तब होश आया, स्पष्टीकरण करने का, जिसके लिए ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ का आश्रय लिया गया था।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ जून, २०२१ ईसवी)