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भोजन पकाकर तृप्ति का विलक्षण अनुभव!

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

वर्षों-बाद भोजन पकाने का अवसर प्राप्त हो रहा है। इस कर्म का एक अपना ही आनन्द है। तरकारी (सब्ज़ी) के नाम पर ‘आलू’ ही था। पाकशाला में ‘बुद्धि-व्यायाम’ किया और भोजन थाली में सज गया।

अपनी साधना में लगा रहा और ‘टब’ में भरा जा रहा जल बाहर बहता रहा। ध्यान कहीं था और तरकारी में नमक अतिरिक्त डालता रहा। सजग हुआ तो नमक की अतिरिक्त मात्रा का बोध हो चुका था।

कढ़ाई (कड़ाही) में तरकारी को ऊपर-नीचे करता रहा और बीच-बीच में नमक की अधिकता का भान करता रहा; चखता रहा। पूरी आँच में चूल्हा अपना पराक्रम दिखाता रहा। तरकारी का रसभरा मसाला सूख चुका था; भरपूर पानी उड़ेला; थोड़ी देर बाद वह भी सूख चुका था; तरकारी अधपकी थी; फिर पानी उड़ेला। थोड़ी देर-बाद तरकारी मेरे पक्ष में आत्मसमर्पण कर चुकी थी। उसी के समानान्तर दूसरे चूल्हे पर तवे पर रोटी को गरम कर चूल्हे की आँच में रोटियों की सेंकाई होती रहीं।
पाकशाला में ‘वास्तविक’ चूहे उछल-कूद करते दिख रहे थे और पेट में ‘कहावती’ चूहे कबड्डी खेलते अनुभव हो रहे थे।

तरकारी में से आलू का एक छोटा टुकड़ा निकाल कर थाली में रखा। वह लघु टुकड़ा भी लहक रहा था; छूते ही अँगुली को बेजाँ हरकत करने की सज़ा मिल चुकी थी।

मोटी-मोटी रोटियाँ पकाने की ‘डी० लिट्०’ (डी.लिट., डी.लिट्०, डी०लिट० अशुद्ध हैं।) पा चुका हूँ। आटा ने न जाने कैसी क़सम खायी है कि जब भी रोटियाँ पकाता हूँ, पाँच की संख्या में बनती आयी हैं।

तीन रोटियों में शुद्ध घी ‘घँसा’ (चुपड़ा)। शुद्ध घी का प्रयोग माथा ऊँचा कर और छप्पन इंच का सीना तान कर कह रहा हूँ; क्योंकि ‘घर में ही मिलावटी दूध’ से बनाया घी है।

तरकारी का स्वाद लिया; लेकिन बेशर्म नमक जाने का नाम ही नहीं ले रहा था। उसकी काट के लिए ‘टमाटर लाल’ और ‘नीबू’ बाबू से पहले से ही ‘ख़ुदपरस्ती’ वाली दोस्ती कर ली थी; राहत की साँस आश्वासन दे रही थी।

पेट महाराज का आदेश होते ही मन का निर्देश था– जल्दबाज़ी ठीक नहीं। फिर क्या था, निवाले गले के नीचे ऐसे उतर रहे थे, मानो कोई पर्वतारोही सँभल-सँभल कर उतर रहा हो।

दही पाँड़े बग़ल में ही थे। अचार बबुआ और हरी मिर्ची बबुनी थाली के एक ख़ाने में अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही थीं; अन्तत:, भोजन-कार्यक्रम सम्पन्न हो चुका था, फिर भी एक रोटी और थोड़ी तरकारी ८ जून के लिए प्रतीक्षा-सूची में बनी रहीं।
इतना बताने का मतलब यह नहीं कि मैं पाकशाला का पराजित योद्धा हूँ। आपकी जानकारी के लिए बताता चलूँ कि रोटी, चावल, दाल, पराठा (परेठा), पूड़ी, हलुआ, चिल्ला, घुँघनी बना लेता हूँ। जीवन में नीर-क्षीर विवेकी की भूमिका की ठीकेदारी की है, इसलिए ‘खिचड़ी’ वाला काम कभी किया ही नहीं। हाँ, खिचड़ी के चार भतारों में से तीन भतारों (भर्तार, पति) ‘चोखा, चटनी, अचार’ बना लेता हूँ; और भी बहुत कुछ। मेरा सर्वप्रिय भोजन है :– रोटी, दूध, गुड़ (चीनी)। मेरे बाबू जी जब परिवार के साथ भोजन करने बैठते थे और उस समय थालियों में ‘खिचड़ी’ दिखती थी तब वे बताते थे, “खिचड़ी के चार भतार :– चोखा, चटनी, घी, अचार।”

वैसे एक अन्दरूनी राज़ साझा कर रहा हूँ; किसी और को किसी भी क़ीमत पर मत बताइएगा; क्योंकि मूर्खताभरी बातें सभी को नहीं बतायी जातीं। जब भी दूध पकाने का ज़िम्मा लेता हूँ, प्राय: उसकी जलन की गन्ध, धुआँ आस-पास के घरों को धन्य करता रहा है तथा बरतन नीचे से ऊपर तक इतना काला हो जाता है कि कृष्णपक्ष की काली रात एक पाँव पर खड़ी होकर पनाह माँगने लगती है।

एक क़िस्सा सुनाऊँ– उन दिनों मैं आगरा में ‘प्रतियोगिता दर्पण’ पत्रिका का कार्यकारी सम्पादक होता था। किराये के घर में रहता था। चूल्हे पर पूरी आँच में दूध भरा बरतन बैठाकर अपने अन्य कर्मों में लग गया; उसी धुन में कार्यालय के लिए निकल पड़ा। लगभग पाँच सौ मीटर जाने के बाद माथा ठनका और तेज़ी में पहुँचा; दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते दूर से ही समूचे घर से भयंकर धुआँ निकलता रहा। मकानमालिक का उलाहना अलग से। येन-केन-प्रकारेण अग्नि महारानी के ताण्डव और लास्य को ‘भरतनाट्यम’ की ओर मोड़ा। ऐसे न जाने मेरे कितने अद्भुत शौर्य के क़िस्से हैं, तेनालीराम के एक नये संस्करण के रूप में।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ जून, २०२१ ईसवी।)