कछौना, हरदोई। विकासखंड कछौना के अंतर्गत ग्राम सेमरा कला में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में राष्ट्रीय कथा व्यास शिवानन्द भाई जी ने श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन शुक्रवार को अपने प्रवचनों में कहा कि संसार में मनुष्य के लिए सबसे बड़ी कल्याण प्राप्ति यही है कि उसका चित्त तीव्र भक्ति योग के द्वारा प्रभु में लगकर स्थिर हो जाए। देखो बुराई छोड़ने में अच्छाई है, लेकिन जो महापुरुषों के कहने पर तुरंत बुराई का त्याग कर अच्छाई को अपना लेते हैं वे बहुत बड़े लाभ को प्राप्त कर लेते हैं।
कथावाचक ने कहा कि यदि तुम्हें सबके स्वामी अंतर्यामी प्रभु का ध्यान, भजन करना है तो सदगुरु की शरण में जाकर ज्ञानोपदेश और उनका आशीर्वाद लेकर अभी से भजन शुरू कर दें। आखिर फिर तुम्हें कब समय मिलेगा। काल की गति बड़ी विचित्र है, जो कभी हरे भरे पेड़ थे वे आज सूखे हो गए हैं और जलने के लिए ईधन बन गए हैं। अत: समय को मत गंवाओ। भगवत ज्ञान गंगा कथा में अपने प्रवचन में यह कहा कि ब्रह्म को जानना क्या है या ब्रह्मज्ञानी किसे कहते है? पूज्य महराज जी ने बताया कि हम उसी वस्तु को जान सकते हैं जो वस्तु हमारी इन्द्रियों की सामर्थ्य सीमा के भीतर एवं मन की पकड़ में और बुद्दि के वृत्त में आ जाये। पर क्या ब्रह्म मन, बुद्धि और इन्द्रियों का विषय बन सकता है। वेद कहता है, –
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतो$यमग्नि:
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्यभासा सर्वमिदं विभाति। (कठो० उ०)
सूर्य बुद्धि का देवता, चन्द्र मन का देवता, तारागण तर्कशक्ति का प्रतीक, विद्युत प्राण शक्ति और अग्नि वाणी शक्ति का प्रतीक, इन सबका ब्रह्म तक पहुँच नही है। इसी भाव को मानस में तुलसीदास जी ने बड़े ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है,-
मन समेत जेहि जान न बानी।
तरक न सकहिं सकल अनुमानी।।
तो जानने के सभी साधन जहाँ पहुँचने से पहले ही अपनी सामर्थ्य खो बैठते हैं उसे कैसे जाना जा सकता है? जिसकी शक्ति से हम सबको जानते हैं उसे किसकी शक्ति से जाने?
बृ०उ० कहता है- विज्ञातारमरे केन विजानीयात्। उस परम चैतन्य को जानने के लिये दूसरा चैतन्य कहाँ से लायें?
केनोपनिषद् में हमारे ऋषियों ने साफ साफ कह दिया-
यस्यामतं तस्य मतं मतं अस्य न वेद स:।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्।
अर्थात, जो कहता है कि ब्रह्म को मै जानता हूँ वह नही जानता है और जो कहता है कि ब्रह्म को मैं नही जानता हूँ वास्तव में ब्रह्म उसी का जाना हुआ है। वही ब्रह्म जो अपने को ब्रह्मज्ञानी कहते हैं उनका नही जाना हुआ है और जो कहते हैं कि हमें ब्रह्म का ज्ञान नही है वह उन्ही का जाना हुआ है। सब मिलाकर भाव यह कि हमे ब्रह्म का ज्ञान विषय ज्ञान की तरह नही हो सकता है। तब कैसे हो सकता है? शास्त्री जी ने आगे कहा कि हम आपको ब्रह्मज्ञानी संत महापुरुषों के सत्संग की कथा सुनाते हैं और बताते हैं कि किन सत्संगों का महा लाभ होता है। ज्ञानी पुरुष पहले भी थे, आज भी हैं और आगे भी होते रहेंगे। मुनि वशिष्ठ महाराज जनकादि बहुत थे। ऋ षि ब्रह्मऋषि एवं राजऋषि ब्रह्मज्ञानी थे। आप ब्रह्म बोध प्राप्त कर लें तो आगे आप भी ब्रह्मज्ञानी हो सकते हैं। शास्त्री जी ने कहा कि ब्रह्म आप अभी भी हैं, ब्रह्म आप सभी हैं, केवल ज्ञान होना ही शेष है। ब्रह्म ज्ञान हो जाए तो आप ब्रह्मज्ञानी। असल बात यह है कि हम चाहते हैं कि आप ब्रह्मज्ञानी, आत्मज्ञानी हो जाएं। आप दियो भाव यानि कि आप स्वयं दीपक बन प्रकाश फैलाओ और इस स्थिति को प्राप्त करने की पहली सीढ़ी है प्रभु चरणों से प्रीति। अद्वितीय ज्ञान गंगा का श्रवण-पान, श्री शिवानन्द भाई श्री के मुखारबिंद से प्रतिदिन अपराह्न 2 बजे से सायंकाल 6 बजे तक प्राप्त किया जा सकता है।
इस अवसर पर संचालक सुरेंद्र पाल सिंह (सेवानिवृत्त बैंक कर्मी), महेंद्र पाल सिंह (अध्यापक), विजेंद्र सिंह, निवेदक अरविंद सिंह (नीशू), जीतेंद्र सिंह (जीतू), भूपेंद्र कुमार सिंह (दीपू) व सैकड़ों पुरुष-महिलाओं ने भागवत कथा का आनन्द लिया।
रिपोर्ट – अंकित वर्मा