समाज में जनसंचार का प्रभाव

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’–


विकास की दृष्टि से जनसंचार का क्या महत्व है यह समझने के लिए जनसंचार के विविध पहलुओं को जानना अत्यावश्यक है । समाज में जनसंचार के माध्यम किस तरह प्रभाव डालते हैं ?  यह प्रभाव किन-किन बातों क्षेत्रों तक विस्तारित होते हैं, यह भी जानना बहुत जरूरी है । आज जब सूचना क्रांति का दौर है, सामाजिक जीवन के प्रत्येक पहलू में सूचना का अपना एक स्थान है. जब बिना सूचना के समाज अपंग है, ऐसे में मीडिया अर्थात जनसंचार माध्यम अपरिहार्य साधन के रूप में समाज के सामने उपस्थित होता है. जनसंचार का महत्व और जनसंचार का प्रभाव एक दूसरे पर पूरी तरह आश्रित हैं. प्रभाव जनसंचार का वह तत्व है जो इसे महत्वपूर्ण बनाता है. जनसंचार एक प्रवाहमयी प्रक्रिया है जिसमें सूचनाएं नित्य-निरंतर प्रवाहित होती रहती है. यह सूचनाएं समाज में जाकर जनमत निर्माण में महती भूमिका निभाते हुए विकास को प्रभावित करती है.

           जनसंचार का केन्द्र और लक्ष्य जन अर्थात “लोक” है या इसे सीधे शब्दों में इस तरह भी कह सकते हैं कि जनसंचार का लक्ष्य और केन्द्र समाज है. जनसंचार की प्रक्रिया का उस स्थिति में कोई अस्तित्व ही नहीं होगा जब इसमें मानव समुदाय शामिल न हो. सामान्यता संचार के तीन तत्व हैं जिनके इर्द-गिर्द यह घूमता है. यह तत्व संदेश, माध्यम और प्रापक हैं. जब यह प्रक्रिया जनसंचार माध्यमों के द्वारा संचालित होती है तब इसमें कुछ और संचार के तत्व मिल जाते है. संदेश निर्माणकर्ता अर्थात लेखक, संदेश का प्रसारक या संचारक, संदेश की छपायी या प्रसारण के दौरान एनकोडिंग और डिकोडिंग के साथ ही प्रापक की संतुष्टि या प्रत्युतर इसके महत्वपूर्ण तत्व हैं. इन सारे तत्वों की एक श्रंखला स्वस्थ संचार की प्रक्रिया को मूर्त रूप देती है. कभी-कभी यह संचार प्रक्रिया विभिन्न अवरोधों के चलते बाधित भी होती है जिससे प्रापक संदेश को अर्थपूर्ण रूप की जगह अनर्थपूर्ण रूप में भी ले सकते हैं. लेकिन यह स्थिति अस्थायी है. जब भी प्रभावी संचार की बात की जाती है,  संदेश की गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है. जिस समाज तक संदेश भेजा जा रहा है उसकी संस्कृति, सभ्यता, भाषा, शिक्षा, सामाजिक स्तर और इच्छाएं क्या संदेश शामिल है ? क्या समाज प्राप्त संदेश से स्वंय जो जोड़ पा रहा है ? यदि हाँ तो संचार उद्देश्यपूर्ण है और नहीं तो संचार का कोई तात्पर्य नहीं.

ठीक इसी तरह जब संचार की सामाजिक विकास में भूमिका की बात की जाती है; उस समय विकास का मतलब भी आवश्यक तत्व होता है. हम विकास किसे कहते हैं ? क्या आर्थिक विकास ही विकास का मानक है ? क्या समग्र विकास को गौण समझा जाता है  ? वास्तव में समाज का समग्र विकास ही वास्तविक विकास है. समग्र विकास आज इतने संकुचित अर्थ में प्रयुक्त होने लगा है कि सिर्फ आर्थिक विकास ही इसका मानक बन गया है. यदि समग्र विकास का दायरा देखा जाए तो यह बहुत ही व्यापक है. इसके अंतर्गत सामाजिक विकास, आर्थिक विकास और राजनैतिक विकास को शामिल किया जाता है. वर्तमान परिदृश्य में आर्थिक विकास को ही समग्र विकास बनाकर पेश करने का चलन बन गया है. आज की मीडिया भी विकास को समझने में चूक कर रही है या कहें वह विकास को समझना ही नहीं चाहती है. सामाजिक विकास में स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन शैली का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है और कहीं न कहीं ये सभी तत्व भारतीय संविधान मौलिक अधिकार के रूप में प्रदान भी करता है. ऐसे में इन तत्वों पर वर्तमान जनसंचार प्रणाली द्वारा कम ध्यान दिया जाना मीडिया के उद्देश्यों में अस्पष्टता प्रतिबिंबित करता है.

आज जनसंचार माध्यमों के द्वारा एक नयी विधा का चलन बढ़ा है और यह विधा विकासपरक या विकासात्मक पत्रकारिता के रुप में जानी जाती है. वैसे इसमें पर्यावरण और कुछ एक मामलों में कृषि व ग्रामीण समस्याओं को ही शामिल किया जाता है. भारत में पत्रकारिता को देश का चतुर्थ स्तम्भ कहा जाता है. लेकिन भारतीय जनसंचार माध्यम अपने संदेशों में भारत की आधी से ज्यादा आबादी को हाशिए पर डाले हुए है. ऐसे में मीडिया की जिम्मेदारी और कार्यप्रणाली की गहन अध्ययन की जरूरत है. साथ ही मीडिया को उस वर्ग की भी आवाज बनने की आवश्यकता है जो आज भी अपनी पहचान को जूझ रहा है. जो मीडिया आज राजनैतिक और आर्थिक डोरों से संचालित होने वाली कठपुतली बनी है, उसे भारत की ग्रामीण आबादी की आवाज बनने की जरूरत है. आज 21 वीं सदी में मीडिया निश्चित ही सुपर पॉवर बन कर उभरी है लेकिन ऐसी शक्ति सदैव ही अर्थहीन रही है जो मजबूरों व मजलूमों के हक में प्रयोग में न लायी जाए या आए.

मीडिया या पत्रकारिता के बारे में कहा जाता है कि समाचार माध्यम जनता की संसद हैं, जहाँ निरंतर अधिवेशन होते रहते हैं । यह संसद कभी स्थगित नहीं होती और न ही यहाँ जवाबदेही से बचने के लिए कोई विकल्प ही होता है । प्रश्नकाल और अन्य कार्यवाहियाँ अबाध गति से साथ – साथ चलती हैं । यहाँ निर्णायक की भूमिका का निर्वहन जनता जनार्दन करती है । विकासात्मक पत्रकारिता एक खुशनुमा अहसास देने वाला शब्द मात्र है, प्रायोगिक तौर पर इसकी स्थिति शून्य से ज्यादा कुछ नहीं है । यही शून्य यदि किसी पूर्णांक के साथ जुड़ जाए तो राशि का निर्माण करता है, लेकिन यदि आत्ममुग्धता में पड़ा रहे तो कूड़े से भी बदतर होता है । जब पूरा विश्व एक नई दुनिया का सृजन कर रहा है भारत में कुछ जनजातियाँ आज भी नंगी रहती हैं । आज जब अमेरिका जब अन्य ग्रहों पर बसने की सोच रहा है ; भारत अपनी ही जमीन का समुचित उपयोग नहीं कर पा रहा है । इन सभी के पीछे है एक सशक्त और व्यवस्थित समाज अर्थात विकसित समाज । यह विकसित समाज सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के व्यवस्थित साधनों और संसाधनों का परिणाम है । सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के क्षेत्र में महती भूमिका निभाने वाला मीडिया जहां भी अपने कार्यों को इमानदारी से अंजाम देता है समग्र विकास के लिए आधार तैयार करता है । लेकिन जहां मीडिया धन, धोखा और चाटुकारिता के चंगुल में जकड़ा हो वहां विनाश का आधार तैयार होता है । भारत में मीडिया की स्थिति अच्छी नहीं है । विश्व में यह सैकड़ों देशों से पीछे है । जिस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अघिकार हो वहां इसकी दुर्गति यह समझने के लिए पर्याप्त है कि इसका संचालन लोकहित में तो कतई नहीं होता है । धन अर्थात व्यावसायिक हित सर्वोपरि दृष्टिगत होते हैं । भारतीय मीडिया स्वतंत्र होने की बजाए केन्द्रीय मंजूषा में झूल रहा है । यह केंद्र राजनैतिक और आर्थिक कोई भी हो सकते हैं ।