डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
वन की ओर जाने वाले उस मार्ग पर सूर्य अस्ताचल की ओर झुक रहा था। रथ के पहियों से उठती धूल मानो अयोध्या की स्मृतियों को अपने साथ लिए चली जा रही थी। पीछे छूट रही थी राजमहलों की शोभा, सुवर्ण स्तम्भों की चमक, दास-दासियों की चहल-पहल और एक समृद्ध साम्राज्य की सम्पूर्ण वैभव-कथा। आगे था वन—अनिश्चित, कठोर और अपरिचित।
किन्तु उस क्षण सबसे अधिक विचलित यदि कोई था तो वह आर्य सुमन्त्र थे।
उनकी आँखों के सामने महाराज दशरथ का वह विह्वल चेहरा बार-बार आ रहा था जब उन्होंने काँपते स्वर में कहा था—
“सुमन्त्र! यदि राम न लौटें तो कम से कम सीता को लौटा लाना।”
वृद्ध राजा के वे शब्द केवल आदेश नहीं थे; वे एक टूटते हुए पिता की अंतिम आशा थे।
सुमन्त्र जानते थे कि राम को लौटाना असम्भव है। वे राम को बचपन से जानते थे। जिस व्यक्ति ने पिता के एक वचन के लिए राज्य, राजतिलक और सुखों को त्याग दिया हो, उसे संसार की कोई शक्ति लौटा नहीं सकती।
किन्तु सीता…
शायद सीता मान जाएँ।
शायद वह अपने वृद्ध ससुर की दशा सोचकर लौट आएँ।
शायद वह समझ लें कि वन का जीवन उनके लिए नहीं है।
यही विचार लेकर उन्होंने साहस किया और जानकी से कहा—
“देवि! महाराज की आज्ञा है। वन अत्यन्त दुर्गम है। काँटे हैं, हिंसक पशु हैं, वर्षा है, तपती धूप है। आप अयोध्या लौट चलिए।”
कुछ क्षणों तक मौन रहा।
वन की वायु वृक्षों की शाखाओं को हिला रही थी।
सीता ने धीरे से सुमन्त्र की ओर देखा।
उनकी आँखों में आँसू नहीं थे।
वहाँ एक अद्भुत शान्ति थी।
मानो कोई गहरा निर्णय बहुत पहले ही लिया जा चुका हो।
उन्होंने विनम्र स्वर में कहा—
“तात! एक बात बताइए।”
“कहिए पुत्री।”
“क्या कभी किसी ने शरीर से अलग होकर उसकी छाया को जीवित रहते देखा है?”
सुमन्त्र चुप रहे।
सीता आगे बोलीं—
“क्या सूर्य की प्रभा सूर्य को छोड़कर कहीं और निवास करती है?”
“नहीं।”
“और क्या चन्द्रमा से अलग होकर चाँदनी का कोई अस्तित्व है?”
सुमन्त्र का सिर झुक गया।
सीता मुस्कराईं।
“तात! तब फिर आप मुझसे यह कैसे कह सकते हैं कि मैं राम से अलग होकर जीवित रह सकती हूँ?”
यह केवल एक पत्नी का उत्तर नहीं था।
यह उस आत्मा का कथन था जिसने अपने अस्तित्व को दूसरे अस्तित्व में विलीन कर दिया था।
सुमन्त्र ने पुनः प्रयास किया।
“पुत्री! मैं तुम्हारे प्रेम को समझता हूँ। किन्तु विचार करो। तुम्हारे पिता मिथिला नरेश जनक हैं।”
जनक…
यह नाम सुनते ही स्मृतियों का एक विशाल द्वार खुल गया।
सीता की आँखों में बचपन उतर आया।
मिथिला के उपवन…
राजमहल के प्रांगण…
पिता की गोद…
माता सुनयना का स्नेह…
सब कुछ जैसे एक क्षण में जीवित हो उठा।
किन्तु अगले ही क्षण उन्होंने धीरे से कहा—
“हाँ तात! मैंने वह वैभव देखा है।”
“मैंने देखा है कि बड़े-बड़े नरेश पिता के चरणों में मस्तक झुकाते थे।”
“मैंने देखा है कि जहाँ उनकी दृष्टि पड़ती थी वहाँ सम्मान खिल उठता था।”
“किन्तु एक बात बताइए…”
“यदि किसी बगीचे में संसार के सभी पुष्प खिले हों और उसमें सुगन्ध ही न हो, तो क्या वह बगीचा प्रिय लगेगा?”
सुमन्त्र मौन रहे।
“मेरे लिए राम वही सुगन्ध हैं तात।”
“उनके बिना मिथिला भी केवल पत्थरों का नगर है।”
सन्ध्या गहराने लगी थी।
वन के पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे।
सीता की वाणी अब और भी गंभीर हो गई।
“तात! संसार का सबसे बड़ा भ्रम क्या है, जानते हैं?”
“क्या?”
“यह मान लेना कि सुख वस्तुओं में रहता है।”
“मनुष्य महलों में सुख ढूँढ़ता है।”
“राज्य में सुख ढूँढ़ता है।”
“धन में सुख ढूँढ़ता है।”
“किन्तु सुख वहाँ नहीं होता।”
“सुख तो उस प्रेम में होता है जहाँ आत्मा को अपना घर मिल जाए।”
“जिसे वह घर मिल गया, उसके लिए वन भी स्वर्ग है।”
“और जिसे वह घर नहीं मिला, उसके लिए स्वर्ग भी वनवास है।”
सुमन्त्र का हृदय काँप उठा।
उन्हें लगा जैसे वे किसी राजकुमारी से नहीं, किसी ऋषि से संवाद कर रहे हों।
कुछ दूर राम खड़े थे।
वे इस वार्ता को सुन रहे थे।
उनके नेत्र नम थे।
वे जानते थे कि सीता को रोकना असम्भव है।
क्योंकि यह प्रेम सामान्य नहीं था।
यह वह प्रेम था जिसमें अधिकार नहीं, केवल समर्पण था।
राम ने मन ही मन सोचा—
“कितना विचित्र है प्रेम।”
“यह किसी को बाँधता नहीं, फिर भी सबसे गहरा बंधन बन जाता है।”
“यह स्वतंत्रता भी देता है और स्वयं को अर्पित भी कर देता है।”
रात्रि उतर आई।
आकाश में असंख्य तारों का विस्तार था।
सीता दूर क्षितिज को देख रही थीं।
उनके मन में अयोध्या की स्मृतियाँ उठ रही थीं।
माता कौशल्या…
माता सुमित्रा…
उर्मिला…
राजमहल…
सब कुछ।
क्षण भर के लिए हृदय भर आया।
किन्तु अगले ही क्षण उन्होंने स्वयं से पूछा—
“क्या वास्तव में मैं अयोध्या छोड़ आई हूँ?”
उत्तर भीतर से आया—
“नहीं।”
“जहाँ राम हैं वहीं अयोध्या है।”
“स्थान बदलते हैं।”
“प्रेम नहीं।”
“भवन बदलते हैं।”
“संबंध नहीं।”
“परिस्थितियाँ बदलती हैं।”
“सत्य नहीं।”
और उसी क्षण उन्हें अनुभव हुआ कि वनवास वास्तव में वियोग नहीं है।
वियोग तो वहाँ होता है जहाँ निकट होकर भी हृदय दूर हों।
जहाँ प्रेम हो, वहाँ दूरी भी मिलन बन जाती है।
उस रात सुमन्त्र सो नहीं सके।
राम के प्रति उनका प्रेम उन्हें एक ओर खींच रहा था।
दशरथ की आज्ञा दूसरी ओर।
और सीता के शब्द उनके भीतर किसी मन्त्र की तरह गूँज रहे थे—
“छाया शरीर को छोड़कर कहाँ जा सकती है?”
उन्होंने पहली बार अनुभव किया कि प्रेम केवल भावना नहीं है।
वह दर्शन है।
वह अस्तित्व का विज्ञान है।
वह वह बोध है जहाँ दो नहीं रहते।
जहाँ केवल एक सत्य शेष रह जाता है।
और उस सत्य का नाम है—समर्पण।