प्रेम मे अधिकार नहीँ तो वियोग मे कष्ट क्योँ

रात्रि उतर आई थी।

आकाश में असंख्य तारिकाएँ जगमगा रही थीं। मंदाकिनी का जल अब चाँदी-सा चमक रहा था। दूर कहीं किसी पक्षी की करुण पुकार सुनाई दी और फिर समूचा वन मौन में डूब गया।

पर सीता के भीतर मौन नहीं था।

वर्षों से जो प्रश्न अनकहे पड़े थे, वे आज शब्द माँग रहे थे।

उन्होंने धीरे से पूछा—

“माता, यदि प्रेम में अधिकार नहीं, तो फिर वियोग इतना कष्ट क्यों देता है?”

अनसूया कुछ क्षण मुस्कुराती रहीं।

फिर उन्होंने एक सूखा पत्ता उठाया और उसे अपनी हथेली पर रख लिया।

“यह पत्ता देख रही हो?”

“हाँ।”

“जब यह वृक्ष से जुड़ा था, तब हरा था। जीवित था।”

“हाँ।”

“और आज?”

“सूख गया है।”

“क्यों?”

“क्योंकि यह वृक्ष से अलग हो गया।”

अनसूया ने पत्ता हवा में छोड़ दिया।

वह धीरे-धीरे उड़ता हुआ अंधेरे में खो गया।

“पुत्री, संसार के अधिकांश लोग प्रेम नहीं करते, वे सहारे खोजते हैं।”

“सहारे?”

“हाँ। कोई किसी व्यक्ति को अपने अकेलेपन से बचने का साधन बना लेता है, कोई अपनी असुरक्षा का कवच, कोई अपने भय का आश्रय।”

“और इसे प्रेम समझ लेता है।”

सीता ध्यान से सुन रही थीं।

“जब वह सहारा छूटता है, तब दुःख होता है।”

“क्योंकि व्यक्ति प्रेम नहीं, अपने सहारे के खोने पर रो रहा होता है।”

सीता ने पूछा—

“तो क्या सच्चे प्रेम में दुःख नहीं होता?”

अनसूया ने उत्तर दिया—

“सच्चे प्रेम में भी पीड़ा होती है, पर वह पीड़ा खोने की नहीं होती।”

“फिर कैसी?”

“विस्तार की।”

“जैसे बीज को वृक्ष बनने में पीड़ा होती है।”

“जैसे नदी को समुद्र तक पहुँचने में पीड़ा होती है।”

“जैसे अहं को प्रेम बनने में पीड़ा होती है।”

सीता की आँखें नम हो गईं।

उन्हें लगा जैसे उनके भीतर कुछ धीरे-धीरे पिघल रहा हो।

अनसूया ने उनकी ओर देखा।

“तुम्हें राम से प्रेम है?”

“अपने प्राणों से भी अधिक।”

“यदि एक दिन राम तुम्हारे पास न रहें तो?”

सीता का चेहरा पीला पड़ गया।

“ऐसा मत कहिए माता।”

“मैं घटना की नहीं, सत्य की बात कर रही हूँ।”

कुछ देर तक मौन छाया रहा।

फिर अनसूया बोलीं—

“जिस प्रेम का अस्तित्व किसी व्यक्ति की उपस्थिति पर निर्भर हो, वह अभी पूर्ण नहीं हुआ है।”

“पूर्ण प्रेम क्या है?”

“जहाँ व्यक्ति माध्यम रह जाए और प्रेम स्वयं साध्य बन जाए।”

“मैं समझी नहीं।”

“राम से प्रेम करते-करते यदि तुम प्रेममयी हो जाओ, तब प्रेम पूर्ण है।”

“और यदि राम के बिना प्रेम समाप्त हो जाए?”

“तो वह प्रेम नहीं था, आसक्ति थी।”

सीता ने पहली बार अनुभव किया कि प्रेम और आसक्ति के बीच का अंतर कितना सूक्ष्म है।

संसार दोनों को एक ही समझता है।

परंतु दोनों में उतना ही अंतर है जितना आकाश और बादल में।

बादल आते-जाते हैं।

आकाश बना रहता है।

आसक्ति बदलती है।

प्रेम बना रहता है।

अनसूया ने आगे कहा—

“पुत्री, मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह सोचता है कि उसे प्रेम चाहिए।”

“क्या यह भ्रम है?”

“हाँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि प्रेम माँगा नहीं जाता, प्रेम हुआ जाता है।”

“जैसे सुगंध फूल से नहीं माँगी जाती।”

“जैसे प्रकाश सूर्य से नहीं माँगा जाता।”

“वे अपने स्वभाव से उत्पन्न होते हैं।”

“उसी प्रकार प्रेम आत्मा का स्वभाव है।”

सीता ने पूछा—

“यदि प्रेम आत्मा का स्वभाव है, तो संसार में इतनी घृणा क्यों है?”

अनसूया ने उत्तर दिया—

“क्योंकि लोग स्वयं को शरीर समझ बैठे हैं।”

“शरीर सीमित है।”

“आत्मा असीम है।”

“सीमितता भय पैदा करती है।”

“भय संग्रह पैदा करता है।”

“संग्रह आसक्ति पैदा करता है।”

“और आसक्ति अंततः घृणा और दुःख को जन्म देती है।”

वन में हवा का एक झोंका आया।

कुछ पत्तियाँ टूटकर धरती पर गिर गईं।

अनसूया उन्हें देखती रहीं।

“इन पत्तियों को देखो।”

“ये विरोध नहीं करतीं।”

“ऋतु बदलती है और ये स्वयं को समर्पित कर देती हैं।”

“मनुष्य समर्पण से डरता है।”

“उसे लगता है कि समर्पण हार है।”

“जबकि समर्पण ही सबसे बड़ी विजय है।”

“क्योंकि जहाँ समर्पण होता है, वहाँ अहं समाप्त होता है।”

“और जहाँ अहं समाप्त होता है, वहीं से परमात्मा का आरम्भ होता है।”

सीता की आँखें बंद हो गईं।

उन्हें लगा जैसे वर्षों से मन में संचित धूल किसी वर्षा से धुल रही हो।

अचानक उन्होंने पूछा—

“माता, संसार आपको महान पतिव्रता कहता है।”

“क्या वास्तव में पतिव्रता होना इतना महान है?”

अनसूया हँस पड़ीं।

“यदि उसका अर्थ केवल पति तक सीमित हो, तो नहीं।”

“फिर?”

“पतिव्रता वह है जिसकी चेतना अपने सत्य से कभी विचलित न हो।”

“जिसका मन परिस्थितियों से न डगमगाए।”

“जिसका प्रेम लाभ-हानि से ऊपर उठ जाए।”

“जिसकी निष्ठा सुख-दुःख के साथ न बदले।”

“वही पतिव्रता है।”

“और वही साधक भी।”

“और वही योगी भी।”

“और वही भक्त भी।”

सीता अब समझ रही थीं कि धर्म नियमों का बोझ नहीं, चेतना की अवस्था है।

धर्म बाहर से थोपा नहीं जाता।

धर्म भीतर से प्रकट होता है।

जैसे बीज से वृक्ष।

जैसे दीपक से प्रकाश।

जैसे प्रेम से करुणा।

और तभी उन्हें अनुभव हुआ कि वनवास केवल अयोध्या से दूरी नहीं था।

वनवास उस सीता से दूरी थी जो स्वयं को केवल जनकनन्दिनी, रामपत्नी और अयोध्या की रानी समझती थी।

और निकटता उस सीता से थी जो पहली बार स्वयं को आत्मा के रूप में जानने लगी थी।

रात्रि और गहरी हो गई।

पर भीतर एक नया सूर्योदय प्रारम्भ हो चुका था।