मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ)
बहारें चल कर आएंगी तेरा दामन सजाने को |
मैं फिर से लौट आऊँगा तेरी दुनिया बसाने को ||
तुझे मिलने की ख़ातिर ग़र क़यामत का सफ़र ही है |
क़यामत ख़ुद ही आएगी मुझे तुझसे मिलाने को ||
याद रखना प्यार अपना भूल कर सब गुनाह मेरे |
इतना ही बहुत होगा मुझे दिल से रुलाने को ||
याद तेरी नहीं जाती मैं रोता हूँ बहुत छुप कर |
बात मुझसे नहीं करना बहुत है दिल दुखाने को ||
मेरी ग़ज़लों में तेरा ज़िक्र बस यूँ ही नहीं होता |
अमीरी मेरी तुझसे है ज़माने में दिखाने को ||
नींद मुझको नहीं आती तुम्हें मालूम है हमदम |
क़ब्र दिल में बना लेना मुझे ख़ुद में सुलाने को ||
बिताना चंद दिन भी अब मुझे मुश्क़िल बहुत लगता |
बहुत कुछ है भुलाने को बहुत कुछ है सुनाने को ||
मुक़द्दर है तबाही का तेरा तू देख लेना ‘मन’ |
कभी आवाज़ न देगा तुझे ज़ुल्मी बुलाने को ||