मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ)
मुझको नहीं मालूम है कैसे तेरे अन्दर ज़िन्दा हूँ मैं
तेरे दिल की क़ैद में रोता टूटा एक परिन्दा हूँ मैं।
सारे जहाँ की ख़ुशियों को मैं ठोकर मार के बैठ गया
जान तुम्हारे प्यार का लेकिन सच में ही नादीदा हूँ मैं।
लगता है जैसे मेरे दिल से धड़कन मेरी छूट गई है
फिर भी साँसें टूटी नहीं हैं इससे बहुत शर्मिंदा हूँ मै।
मेरी मुहब्बत झूठ नहीं है तू ही न समझे मेरी वफ़ाएं
ख़ुद ही ख़ुद का क़ैदी हूँ मैं ख़ुद ही ख़ुद का ज़िन्दान हूँ मैं।
राह हमारी जब से जुदा है तब से बहुत मैं भी तड़पा
तेरी तड़प को समझा है मैंने जान बहुत ग़मदीदा हूँ मैं।
‘मन’ का भरम सब टूट गया है आज हकीक़त है ये कि
तेरे दिल की बस्ती में अब भी एक ही बस बाशिंदा हूँ मैं॥
नादीदा = लालची
ज़िन्दान = कारागृह