मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ-
पल-पल जो बढ़ रही है उस तिश्नगी पे रोए |
ग़म-ए-ज़िन्दगी से ज़्यादा ग़म-ए-आशिक़ी पे रोए ||
मेरा राब्ता नहीं अब कुछ तुझसे रह गया है |
रग-रग में फिर भी तू है इस बन्दग़ी पे रोए ||
तीरा फ़जा थी लेकिन शब-ए-वस्ल समझ बैठे |
शब-ए-वस्ल नहीं आई शब-ए-तीरगी पे रोए ||
कुछ था कहा किसी से तूने मुझको देख कर ही |
कुछ भी समझ सके न तेरी बानगी पे रोए ||
लहरों ने की बग़ावत डूबा मेरा सफ़ीना |
तेरा नाम ले कर डूबे दीवानगी पे रोए ||
क़िस्सा-ए-मुहब्बत का ‘मन’ क़ातिब-ए-मुक़द्दर |
फिर भी न हर्फ़ बदले और सादगी पे रोए ||