प्रेम क्या होता है ?
मैंने कहा : तुम्हें जब प्रत्येक वस्तु अच्छी और सुंदर लगने लगे,
अच्छे से अच्छा बनने का मन करे,
किसी को नि:स्वार्थ भाव से स्वयं को समर्पित कर देना चाहो
और मन की सारी कोमल भावनाएँ जागृत हो जाएँ ।
या यूँ कहूँ कि तुममें देवत्व का गुण आ जाए,
जहाँ छल और चातुर्य का कोई स्थान न हो
यही प्रेम है,
जैसे तुम्हारा और मेरा प्रेम ।
तो क्या ये प्रेम ऐसे ही चलता रहेगा?
दिवस की भाँति इसका भी अवसान न हो जाएगा?
क्या चिरस्थायी रहेगा कुछ भी?
क्या चिरस्थायी है कुछ भी?
तुम्हारा यह प्रश्न कि चिरस्थायी रहेगा कुछ भी ?
मैं कैसे कह सकता हूँ कि मैं और तुम हमेशा रहेंगे
कि हम हमेशा ऐसे ही रहेंगे।
और यह भी नहीं कह सकता
कि मेरे ये शब्द भी हमेशा रहेंगे ।
बस रहेंगे तो केवल ये अहसास
कि हम दोनों कभी मिले थे।
हम दोनों के बीच अगाध प्रेम था।
वह हमारे जाने के बाद भी रहेगा।
जब-जब किसी के मन में प्रेम जगेगा
या कोई किसी से प्रेम करेगा ,
उनके अहसासो में हम फिर से जीवित हो उठेंगे ।
क्योंकि वही अहसास तो हमारा प्रेम था
या उस अहसास से हम दोनों थे।
इस तरह यह प्रेम हमेशा रहेगा
और हम भी चिरस्थायी रहेंगे!!
??
मुझे शब्दों में न उलझाओ
बस ये बतलाओ क्या चिरस्थायी रहेगा कुछ भी?
तो सीधा उत्तर सुनो –
हाँ रहेगा ,
वह है हमारा प्रेम
या
यूँ कहूँ ‘प्रेम’!
----प्रो० जयराम कुर्रे