● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
कुछ लोग गाँव, गाँववालों तथा किसानों की दुरवस्था से वाक़िफ़ नहीं रहते; परन्तु उनकी ख़ुशहाली की सारंगी ज़रूर बजाते रहते हैं। गाँव में दो तरह के किसान रहते हैं :--- पहला वह है, जो अपने संसाधनों से येन-केन-प्रकारेण खेती 'करता' है और दूसरा वह है, जो संसाधनों का दोहन करते हुए, अपनी खेती 'कराता' है। पहलावाला किसान तरह-तरह के अभावों में डूबते-उतराते हुए, अपना और अपने परिवारवालों की आजीविका का निर्वहण करता है, जबकि दूसरावाला किसान एक 'उद्योगपति' के रूप में रेखांकित होता है और सारे लाभ प्राय: उसी के हक़ में आते रहते हैं; क्योंकि वह रसूख़दार होता है; ग्रामप्रधान रहा होता है और हारा हुआ एम०एल०ए० भी।
सामान्य किसानों से पूछिए कि उन्हें गेहूँ और आलू की ख़रीद में राहत मिली है क्या। गन्ना किसान अब भी परेशान हैं।
लाल बत्ती-नीली बत्ती ख़त्म हो जाने से जनसामान्य को क्या लाभ मिला है? सफ़ेदपोशों की रुआबदारी में कहीं-कोई कमी दिख रही है क्या? बैंकों से क़र्ज़ लेने में किसानों के पसीने छूट रहे हैं। बैंक के मैनेजर बिना कमीशन लिये ऋण देने को तैयार नहीं। तहसील में चपरासी से लेकर लेखपाल, तहसीलदार, राजस्व अधिकारी, निबन्धक (रजिस्ट्रार) उपनिबन्धक (डेप्युटि रजिस्ट्रार), नायब तहसीलदार, उप प्रभागीय न्यायाधीश (एस० डी० एम०) तक बिना रिश्वत लिये काम करने को तैयार नहीं और ज़िला-प्रशासन, राज्य-शासन-प्रशासन को आपके हित के प्रति कहीं कोई चिन्ता नहीं दिखती। वहाँ 'बुलडोज़र' चलाने का साहस 'नपुंसक' बना दिखता है।
अब बन्द कमरे से बाहर निकलकर वास्तविकता को समझने की आवश्यकता है और अपनी प्राथमिकताएँ निर्धारित करने की भी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ जून, २०२२ ईसवी।)