नितान्त असभ्य दिख रहा गुजरात का ‘चुनावी प्रचार’!

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का आज का सम्पादकीय

विधानसभा-चुनाव गुजरात-राज्य मे होनेवाला है; परन्तु वहाँ का सत्ताधारी दल और उनके तथाकथित चालीस स्टार प्रचारक यह नहीं बता पा रहे हैं कि वर्षों तक गुजरात मे रहनेवाली उनकी सरकार ने जनहित मे कौन-कौन-से काम किये हैं। लगता है, उन्हें लेटा-लेटाकर काँग्रेस ने ऐसा पिलाया है कि छटकते, मटकते, सटकते, लटकते तथा भटकते नज़र आ रहे हैं। कथित सरकार ने लगभग समूची मन्त्रिपरिषद् और अपने दलवाले कई राज्यों के मुख्यमन्त्रियों को चुनाव-प्रचार करने के लिए झोंक दिया है। वे सभी राज्य इस समय मुख्यमन्त्रिविहीन दिख रहे हैं। क्या यह आपराधिक कृत्य नहीं है? चुनाव-आयोग के अधिकारी ‘निष्क्रिय’ दिख रहे हैं; क्योंकि देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं को ‘पराधीन’ बना लिया गया है।

पिछले दिनो गुजरात के मोरबी ज़िले के ‘सस्पेंशन ब्रिज’ के टूटकर ‘मच्छु नदी’ मे गिर जाने से सैकड़ों आबाल वृद्ध नर-नारी मारे गये थे, उस प्रकरण पर गुजरात की नृशंस सरकार अभी तक मौन बनी हुई है; क्यों?

कोरोना-काल मे जिस तरह से वहाँ की जनता तड़प-तड़पकर मरी थी अथवा यों कहें तड़पा-तड़पाकर मारा गया था, उस पर वहाँ की सरकार ख़ामोश क्यों है? शासकीय चिकित्सालयों मे समुचित उपचार न मिलने, ऑक्सीजन गैस के अभाव मे तथा दवादिक की उपलब्धता न होने के कारण गुजरात के न जाने कितने लोग तड़प-तड़पकर मर गये थे, जबकि गुजरात-सरकार ने हाथ खड़े कर दिये थे। कुछ माह-पूर्व गुजरात मे जिस तरह से बाढ़ मे बुरी तरह से घिरकर वहाँ जन-धन तथा पशुओं की बहुत अधिक क्षति हुई थी, उस पर क्रूर सरकार और उसके तथाकथित प्रवक्ता मौन साधे हुए हैं; क्यो?

वहाँ की जनता बेहद महँगी रसोई गैस ख़रीद रही है; खाने-पीने और दैनिक जीवन मे काम आनेवाली अनिवार्य वस्तुओं के दामो मे बेतहाशा बढ़ोतरी (‘बढ़ोत्तरी’ अशुद्ध है।) कर दी गयी है; जीवनरक्षक दवाओं के मूल्य आकाश छू रहे हैं। गुजरात के शिक्षित और अर्द्ध-शिक्षित युवावर्ग बेरोज़गार हैं; उनके भविष्य को ग्रहण लग चुका है। इन विषयों पर गुजरात-सरकार मौन क्यों बनी हुई है?

निर्लज्जता की पराकाष्ठा यह है कि राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ अभियान के अन्तर्गत किसी कार्यक्रम मे देश के राष्ट्रगान के स्थान पर असावधानीवश ‘नेपाल का राष्ट्रगान’ बजा था; अब उसे धूर्त्त क़िस्म के नेताओं ने ‘चुनावी विषय’ बना दिया है। राहुल गांधी की ‘टी-शर्ट’ पर एक घृणित नेता ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत कर, अपनी बेहद ओछी मानसिकता का परिचय दे चुका है। एक उस राज्य का वह मुख्यमन्त्री, जिसके कार्यकाल मे देश का सबसे घातक घोटाला ‘व्यापमं-काण्ड’ कराया गया था, उसका कितना घटिया बयान है, “राहुल बाबा खर-पतवार हैं।” वह मुख्यमन्त्री भूल जाता है कि ‘खर-पतवार’ घुसता है तब भीतर-बाहर चीर कर रख देता है। वैसे मक्कारों को यह भी याद करना चाहिए कि सार्वजनिक सभाओं मे उनके आकाओं-द्वारा “बेटी पढ़ाओ-बेटी पटाओ” और कई अश्लील शब्दों के प्रयोग को काँग्रेसी नेताओं ने अपने चुनावी विषय नहीं बनाये हैं।

खेद है! वहाँ के अन्धभक्तों का एक ऐसा वर्ग है, जो किसी ऐसे ‘व्यक्ति’ के नाम और चेहरे पर उसके दल के पक्ष मे मतदान करने का मन बना चुका है, जिसकी अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षा और ज़ुम्लेबाज़ी को जानते समझते हुए भी वह उसके प्रति सम्मोहित है, जबकि वह व्यक्ति उनके क्षेत्र मे तभी तक आत्मप्रचार करता दिखेगा जब तक चुनाव हो नहीं जाते; उसके बाद ‘मै कहाँ और तू कहाँ’ का ही व्यावहारिक रूप दिखेगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ नवम्बर, २०२२ ईसवी।)