आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
तुम्हारी पूर्णता
रास नहीं आती मुझे;
क्योंकि तुम द्रुतगामी प्रकृति से युक्त हो।
हाँ, मै अपूर्ण हूँ।
तुम मुग्ध हो, अपनी पूर्णता पर
और मुझे गर्व है, अपनी अपूर्णता पर;
क्योंकि आज मुझे
एहसास हो रहा है :–
रिक्तता भी बहुत ज़रूरी है,
ज़िन्दगी को तराशने के लिए।
मुझे तलाश है :–
एक मधुर और बिनब्याही अपूर्णता की;
जो अनसुनी, अनकही तथा अनदेखी हो;
जिसके रूप-रस-गन्ध के अनुभव करने का,
अब तक कोई अधिकारी न हो।
वही तो मंजुल, मनहर, मृदुल तथा मोहक अपूर्णता है
और संस्पर्श से परे मंज़िल भी।
आओ!
अपनी अपूर्णता की माँग भर दें;
एक ऐसा आत्मिक प्रस्फुटन कर दें,
जिससे जीवात्मा-परमात्मा का सम्मिलन हो जाये
और हम पूर्ण रहकर भी
अपूर्णता के सनातन साक्षी बने रहें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २९ नवम्बर, २०२२ ईसवी।)