● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
खेती-किसानी है जल रही, शासन की नीति है खल रही। कौन-सा गुनाह था किसानों का? उनकी ख़ुशी हाथ है मल रही। धोखा बना आश्वासन का सूरज, चहुँ दिशि बदली है पल रही। आँखें शनाख़्त१ ख़ुद की करतीं, गिरती-उठती उम्र है ढल रही। वाद:ख़िलाफ़ी हर सू२ देखो, ढपोरशंखी नीयत है छल रही। कनखियाती आँखें हैं देख रहीं, शासन की हर दाल है गल रही। कैसी व्यूह-रचना जाति-धर्म की, जिधर देखो, आफ़त है फल रही!
१ शुद्ध शब्द ‘शनाख़्त’ (पहचान) है; ‘शिनाख़्त’ अशुद्ध है।
२ हर ओर।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २९ नवम्बर, २०२२ ईसवी।)