याद पुरानी घातें आयीं

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

चिन्दी-चिन्दी रातें पायीं,
फाँकों में मुलाक़ातें पायीं।
मुरझायीं पंखुरियाँ देखीं,
कही-अनकही बातें पायीं।
बेमुराद आँसू छलके जब,
याद पुरानी घातें आयीं।
दुलराते बूढ़े ज़ख़्मों को,
यादों की रातें गहरायीं।
शातिर की चालों में हमने,
ठगा-ठगा रह मातें खायीं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ अक्तूबर, २०२० ई०।)