ज्वलन्त ०——-
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
इस देश मे ‘सेंसर बोर्ड’ के अधिकारी निकम्मे हो चुके हैं; क्योंकि उनकी नियुक्तियाँ सरकारी कृपा पर निर्भर करती आ रही हैं। ‘सेंसर बोर्ड’ के सारे नियम अब ‘शासनाधीन’ कर दिये गये हैं। यही कारण है कि जिस फ़िल्म का प्रसारण सरकारी राजनेता चाहेंगे, उसी का होगा; होता भी आ रहा है। उन फ़िल्मो से देश मे किस प्रकार की नकारात्मक प्रतिक्रिया होगी, उसके प्रति किसी को चिन्ता नहीं; उनका हित सधता रहे, यही उद्देश्य रहता है।
बेशक, ‘द केरल स्टोरी’ को दिखाया जाना चाहिए; परन्तु सरकार की घटिया कृत्यों के विरुद्ध यदि किसी अन्य फ़िल्मो का निर्माण किया जाता हो तो उस पर किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं लगाया जाना चाहिए। २७ फ़रवरी, २००२ ई० को गुजरात के इतिहास-प्रसिद्ध उस ‘गोधराकाण्ड’ को जिसे पूर्वनियोजित तरीक़े से कराकर १,००० लोगों की हत्या की गयी थी, क्या उसके सच को दिखाना गुनाह है? उस दंगे मे २५४ हिन्दू मारे गये थे और ७९० मुसलमान। इतना ही नहीं, उस निर्मम रक्तरंजित घटना के दूसरे दिन ही अहमदाबाद की ‘गुलमर्ग हाउसिंग सोसाइटी’ मे अकस्मात् भीड़ ऐसी अनियन्त्रित हुई कि उसने ६९ लोग (‘लोगों’ अशुद्ध है।) की हत्या कर दी थी। अपने देश मे आज़ादी मिलने के बाद इससे बड़ी लोमहर्षक घटना पहले कभी नहीं हुई थी। उस समय गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी थे। आज भी देश की जनता उस नितान्त अमानवीय कृत्य के वास्तविक सत्य से अनभिज्ञ है।
‘परजानिया’, ‘चाँद बुझ गया’ तथा ‘रीयल्टी बाइट्स ऑफ़ गोधरा’ फ़िल्म का निर्माण किया गया था; परन्तु वर्तमान सरकार मे साहस नहीं था कि उन फ़िल्मो को सार्वजनिक कराने के लिए आगे आ सके। सरकार ने उन फ़िल्मो को प्रतिबन्धित कर दिया था। इतना ही नहीं, उन फ़िल्मो के विरोध मे ‘सरकार-स्तर’ और भगवाधारियों के स्तर पर विध्वंसक विरोध शुरू हो गये थे; सरकारी प्रवक्ता भौंकने लगे थे; क्यों?
बेशक, यह समाज को विखण्डित कर, अपने उल्लू सीधा करनेवाले कुछ अति बेशर्म क़िस्म के राजनेताओं-द्वारा प्रायोजित उपक्रम है, जो क्षुद्र और हेय स्वार्थ के लिए किसी भी सीमा का अतिक्रमण कर सकते हैं और करते ही आ रहे हैं। ऐसे निर्लज्ज राजनेताओं को सिर्फ़ अपनी प्रशस्ति ही भली लगती है। ‘द कश्मीर फाइल्स’ फ़िल्म का प्रायोजन कर, देश मे ‘हिन्दू बनाम मुस्लिम’ का घिनौना वातावरण बनाना कोई इनसे सीखे; समस्त सरकारी संसाधनो का बलपूर्वक दुरुपयोग कर, सारी सम्भावनाएँ अपने पक्ष मे करना, कोई इनसे सीखे। जनता मरती हो तो मरती रहे, उनका सरोकार/हेतु/प्रयोजन सिद्ध होता रहे।
हमे नहीं भूलना चाहिए कि ‘भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस’ की ग़लत नीतियों का विरोध करते हुए, ‘क़िस्सा कुर्सी का’, ‘नसबन्दी’, ‘इमरजेंसी’ इत्यादिक फ़िल्मे दिखायी गयी थीं, जो कि समय-सत्य था। देश की सजग जनता किसी भी सरकार के साथ तभी तक रहती है जबतक वह समदर्शी और समधर्मी दिखती रहे, अन्यथा की स्थिति मे देश की जनता पद-प्रहार कर, उनकी अस्लीयत बता देती है। ऐसे गर्हित राजनेताओं को अतीत से सीख ग्रहण करनी चाहिए।
अब प्रश्न है, जब देश के प्रमुख सत्ताधारी राजनेता उस मणिपुर राज्य की अनदेखी कर, बन्द कमरे मे ‘चुस्कियाँ’ और ‘चुटकियाँ’ लेकर ‘द केरल स्टोरी’ देख रहे हैं, जहाँ अब तक वहाँ व्याप्त गृहयुद्ध मे १०० से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और वहाँ भीषण आग धधक रही है; परन्तु एक भी राजनेता अभी तक वहाँ नहीं पहुँचा है; क्यों? उस मणिपुर की वास्तविकता को लेकर फ़िल्म बनायी जाती है तो सरकारी नेता और उनके अनुयायी स्वीकार करेंगे? बेशक, ऐसे सभी राजनेता ‘सत्ता की राजनीति’ को आगे करते हुए ‘राष्ट्रीयता’ को गौण करते आ रहे हैं, जो कि ‘भारतीय लोकतन्त्र’ को कुचलते रहने की उनकी प्रवृत्ति का द्योतक है।
सत्ता बनी रहे; दूसरे के हक़ को बलपूर्वक छीनकर, ख़रीदकर राजनीति करनेवाले कुत्सित, कलुषित तथा गर्हित चरित्रवाले ऐसे राजनेता ‘भारतराष्ट्र’ को संरक्षित-सुरक्षित कर सकेंगे, पूर्णत: संदिग्ध है।
सच तो यह है कि वर्तमान मे ‘भारतीय जनता पार्टी’ बनाम ‘भारत की सरकार’ का संघर्ष चल रहा है; समानान्तर सरकार चलायी जा रही है। यह स्थिति इसलिए है कि व्यवहार-स्तर पर भारतीय जनता पार्टी ‘सरकार’ के पर्याय के रूप मे दिख रही है, जो कि देश के लिए अति घातक सिद्ध हो सकती है।
जब देश की न्यायपालिका राजनेताओं-द्वारा समाज के लिए ‘घृणात्मक शब्दप्रयोग’ करने पर सरकार के लिए कहे― सरकार नपुंसक हो चुकी है; सरकार सामर्थ्यविहीन हो चुकी है तब इससे अधिक ‘लज्जा’ का विषय और क्या हो सकता है!..?
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १० मई, २०२३ ईसवी।)