आत्मसंवाद के क्षण

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

मेरा-जैसा मनुष्य कभी इतना उदारवादी हो जाता है कि अब तक के जीवनकालखण्ड मे जितना कुछ सार्थक बोध कर पाया है, वह सब लुटाता जा रहा है; बिना विचार किये― कौन कुपात्र है और कौन सुपात्र?

जैसे ही भान होता है कि ज्ञानवितरण की दिशा अनुकूल नहीं है, वितरण की क्रिया पूर्ण विराम को प्राप्त कर जाती है; क्योंकि मैने स्वत: स्फूर्त चेतना का विस्तार करके जो कुछ भी सार्थक अर्जन किया है, वह नितान्त ‘मेरा अपना’ है; मौलिक चिन्तन-अनुचिन्तन और अध्यवसाय का प्रतिफलन है।

अकस्मात् एक ‘पागलपन-सा’ सवार हो जाता है― लुटाते चलो, जो कि मेरी आह और संवेदना के स्तर पर सर्वथा ‘आत्मघाती’ प्रतीत होता है। विकल्प कोई नहीं है; एकमात्र मार्ग है, ‘निर्दय’ (‘निर्दयी’ अशुद्ध है।) बन जाओ।
आँखें देखें; पर प्रतीत करो, मानो आँखों ने भी ‘अपनी आँखें’ मूँद ली हों।

इसका संज्ञान है, जबकि ‘अपराधबोध’/’अपराध-बोध’ के सम्मुख नतमस्तक हो जाता हूँ। हृदयपक्ष कहता है :– यदि अशुद्ध दिखे तो शुद्ध कर दो; मस्तिष्क-पक्ष हृदयप्रान्त के प्रतिपक्ष मे आ खड़ा होता है और सत्यपक्ष का प्रश्नात्मक उद्घाटन करने लगता है :– तुमने संसार को सुधारने का ‘ठीका’ (यहाँ ‘ठेका’ अशुद्ध है।) ले रखा है? यहीं पर मेरी ज्येष्ठ पुत्री कंजिका (अध्यापिका) अपनी ‘प्रशिक्षिका’ की भूमिका मे दिखने लगती है, “बाबू जी! आप किसको-किसको सुधारेंगे? आप ‘अपना स्तर’ मत गिराइए। आप अपना समय अपने ‘सर्जनकर्म’ मे लगाइए। आप ऐसे लोग से ‘दूरी’ बनाकर रहिए।”

पुत्री के कथन मे ‘चिरन्तन सत्य’ की झलक मिलने लगती है। उसी झलक का प्रभाव है कि अब अपने को ‘अपनी ओर’ मोड़ने के लिए प्रयासरत हूँ।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ जून, २०२३ ईसवी।)