राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन की जन्मतिथि पर ‘सर्जनपीठ’ की ओर से आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद
‘सर्जनपीठ’ के तत्त्वावधान मे सुप्रसिद्ध चिन्तक-विचारक एवं स्वतन्त्रतासेनानी राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन की जन्मतिथि के अवसर पर १ अगस्त को ‘पुरुषोत्तमदास टण्डन एवं उनका राष्ट्रवाद’ विषयक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन ‘सारस्वत सदन’, अलोपीबाग़, प्रयागराज मे सम्पन्न हुआ, जिसमे देश के बुद्धिजीवीवर्ग की सहभागिता रही।
मुम्बई (महाराष्ट्र) से प्रसिद्ध विज्ञानी एवं पूर्व-कुलपति प्रो० के० पी० मिश्र ने कहा, "टण्डन जी भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस से वर्ष १८९९ से ही जुड़ चुके थे। वे विद्यार्थी-जीवन से ही क्रान्तिकारी गतिविधियों मे हाथ बँटाने लगे थे, जिससे क्रुद्ध होकर अँगरेज़ी प्रशासन ने म्योर सेण्ट्रल कॉलेज, इलाहाबाद से निष्कासित करा दिया था। वर्ष १९०३ मे अपने पिता के निधन के पश्चात् उन्होंने एक अन्य कॉलेज मे अपनी पढ़ाई पूरी की थी। उन्हें वर्ष १९१९ मे देश को स्तब्ध कर देनेवाली घटना 'जलियाँवाला बाग़-हत्याकाण्ड का का अध्ययन करनेवाली भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी-समिति का एक सदस्य बनाया गया था। वे महात्मा गान्धी से बहुत प्रभावित थे। गान्धी जी के कहने पर अपनी वकालत छोड़कर पूरी तरह से स्वतन्त्रता-संग्राम के मैदान मे कूद पड़े थे।"
प्रयागराज से चिन्तक-विचारक, पूर्व-आइ० ए० एस०-अधिकारी डॉ० सुरेन्द्रकुमार पाण्डेय ने कहा, "भारत-रत्न राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन प्रख्यात स्वतन्त्रता संग्रामसेनानी, कुशल राजनयिक और ओजस्वी वक्ता थे। टण्डन जी आर्थिक- शुचिता और नैतिकता के प्रबल पक्षधर थे। वास्तव मे, उनके व्यक्तित्व मे राजनेता और ऋषि का अद्भुत समन्वय था। वे मूलतः सन्त-प्रकृति के थे। साहित्य, समाजसुधार, पत्रकारिता तथा राजनीति के साथ-साथ शिक्षा के प्रचार-प्रसार में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान था। हिन्दी विद्यापीठ, हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद के साथ शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने और हिन्दी की अनन्य सेवा करने की उनकी अनेक प्रेरक स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। राजनीति मे आर्थिक शुचिता और नैतिकता स्थापित करना और हिन्दी को पूरे विश्व की भाषा बनाना ही टण्डन जी के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धाञ्जलि होगी।"
प्रयागराज से गीतकार यश मालवीय ने कहा, "मै हिन्दी के दधीचि के रूप मे टण्डन जी को देखता हूँ। उन्हीं के बल पर एक समय मे दासता का वृत्रासुर मारा गया था।भाषाई ग़ुलामी से उन्होंने हिन्दी को मुक्त कराया था। वे वास्तव मे, हिन्दी के ऋषि है। भाषा के अनथक योद्धा रहे टण्डन जी ने हिन्दी मे अन्य क्षेत्रीय बोलियों और भाषाओं को शामिल कर, निज भाषा के भण्डार को समृद्ध किया। वे व्यक्तिगत जीवन और आचरण मे भी संत थे, तभी तो तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जी ने उन्हें 'भारतरत्न' प्रदान करते हुए कहा था, "व्यक्तिगत गुणों के चलते, उन्हें भारतरत्न की उपाधि से विभूषित किया जा रहा है। वे सच्चे अर्थों में हमारे देश के रत्न हैं। वे महामना मालवीय और बापू के बीच जीवनपर्यन्त एक उत्सव की शक़्ल में ही उपस्थित रहे। उन्हें स्मरण कर मनगंगा नहाया- सा हो जाता है।"
आयोजक भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया, "वर्ष १९४९ मे संविधानसभा मे बहुमत से हिन्दी के पक्ष में प्रस्ताव पारित कराकर हिन्दी को 'राजभाषा' और देवनागरी लिपि को 'राजलिपि' घोषित कराने का श्रेय टण्डन जी को जाता है, तदनन्तर वे उसे राष्ट्रभाषा बनाये जाने की दिशा मे भी लगे रहे; परन्तु तत्कालीन सरकार की राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा के कारण उन्हें सफलता नहीं मिली। हिन्दी के प्रबल पक्षधर टण्डन जी हिन्दी मे भारत की मिट्टी की सुगन्ध महसूस करते थे। उन्होंने वर्ष १९१० मे 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन', वर्ष १९१८ मे 'हिन्दी-विद्यापीठ' तथा वर्ष १९४७ मे 'हिन्दीरक्षक-दल' की स्थापना की थी। टण्डन जी ने हिन्दी को देश की स्वतन्त्रता के पूर्व 'स्वतन्त्रता-प्राप्ति का' और स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् स्वतन्त्रता को बनाये रखने का एक महत् साधन मानते थे। उसके लिए 'हिन्दुस्तानी' भाषा के पक्षधर महात्मा गान्धी के साथ उनका 'मनभेद' हो गया था। इन्दौर मे आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन मे टण्डन जी ने सुस्पष्ट शब्दों मे घोषणा की था, "अबसे राजकीय सभाओं, काँग्रेस की प्रान्तीय सभाओं और अन्य सम्मेलनो मे अँगरेज़ी का एक शब्द भी न सुनायी पड़े।'' टण्डन जी की ऊर्जस्विता और ओजस्विता से प्रभावित होकर सन्त पुरुष देवरहा बाबा ने अनेक विरोधों के बावुजूद उन्हें 'राजर्षि' की पदवी धारण करायी थी।'
प्रयागराज से वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा ने कहा, "राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन सही मायने में राजनीति के ऋषि थे। वे जीवन-पर्यन्त राजनीति में शुचिता तथा हिन्दीभाषा के उन्नयन के लिए संघर्ष करते रहे। वे देश की एकता और अखण्डता के प्रबल पक्षधर थे, इसीलिये उन्होंने भारत-विभाजन का विरोध किया था। इतना ही नहीं, हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दिये जाने के मसले पर उनका प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू के साथ सैद्धांतिक मतभेद भी रहा। राजनीति मे सरकार और संघटन के मुद्दे पर एक बार फिर वे नेहरू से भिड़ गये थे, हालाँकि उन्होंने काँग्रेस-अध्यक्षपद से वर्ष 1950 में इस्तीफ़ा देकर गतिरोध दूर कर दिया। राजर्षि टण्डन को उनके हिन्दुत्व के प्रति आग्रह को लेकर उदार हिन्दुत्ववादी नेता भी कहा जाता है।"
प्रयागराज से कवयित्री एवं वरिष्ठ पत्रकार उर्वशी उपाध्याय ने कहा, "भारत के राजनीतिक सामाजिक जीवन में नयी चेतना, नयी लहर और नयी क्रान्ति का सूत्रपात करनेवाले राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन' को जनमानस ने कर्मयोगी कहा। सविनय अवज्ञा आन्दोलन, लगान की न अदायगी के लिए आन्दोलन, संयुक्त प्रान्त व्यवस्थापिका के सदस्य तदुपरान्त १९३७ मे अध्यक्ष, फिर गोलमेज कांफ्रेंस मे नेहरू जी के साथ गिरिफ़्तारी तथा बिहार किसान आन्दोलन-जैसे क्रान्तिकारी दायित्वों एवं योजनाओं के लिए राजर्षि अगली पंक्ति में खड़े रहे। उनका हिन्दी- प्रेम, आज़ादी पाने और बचाने के लिए हिन्दी की आवश्यकता, हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का संकल्प जीवन का उद्देश्य बना रहा।"
देवरिया से साहित्यकार इन्द्रकुमार दीक्षित ने कहा, "अनुच्छेद ३४४ राजभाषा आयोग के अधीन १९५७ में गठित जी० वी० पंत समिति की सिफारिशों मे कहा गया था :– हिन्दी प्रधान राजभाषा रहे; परन्तु अँगरेज़ी को सहायक राजभाषा बनाये रखा जाय'', इसका राजर्षि टण्डन ने सदन मे प्रबल विरोध किया था।भारतविभाजन, धर्मपरिवर्तन क़ानून और राजभाषा के रूप मे अँगरेज़ी को जारी रखने के मुद्दे पर प्रधानमन्त्रीत्री पं० नेहरू के साथ राजर्षि टण्डन जी के तीव्र मतभेद रहे। उन्होंने भारत-विभाजन का विरोध करते हुए सदन में कहा था कि इस विभाजन से कोई लाभ नहीं; क्योंकि इससे दोनो देशों मे हिन्दू और मुस्लिम भयग्रस्त रहेंगे।सांसद रहते हुए राजर्षि पुरुषोत्तम दास जी ने अपने वेतन की समस्त धनराशि 'लोक सेवानिधि ' मे स्थानान्तरित कराकर, जन- कल्याण को समर्पित कर दिया था। राष्ट्रभाषा हिन्दी और देव नागरी लिपि को जनमानस तथा संविधान में सुस्थापित कराने के सक्रिय और अविरल प्रयास तथा संघर्ष के लिए हिन्दीभाषा सदैव राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन जी के प्रति ऋणी रहेगी।"