आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

आइए! आभासी और वास्तविक दुनिया के हम समस्त मित्रवृन्द समवेत स्वर मे संकल्प करें (‘संकल्प लें’ अशुद्ध है।) :–
किसी भी महिला-पुरुष को ‘मैडम-सर’ के स्थान पर क्रमश: ‘महोदया’ और ‘महोदय’ शब्दों से ही सम्बोधित करेंगे। उससे पहले ‘महोदय’ और ‘महोदया’ के अर्थ को समझेंगे; क्योंकि भारत का लगभग पंचानवे (‘पंचानबे’ अशुद्ध है।) प्रतिशत व्यक्ति ‘महोदय’ और ‘महोदया’ अर्थ जाने बिना उनका व्यवहार करता आ रहा है।

‘महत्-उदय’ (बहुव्रीहि समास) विग्रह से ‘महोदय’ शब्द का रूप उभरता है। यह प्रभुतापूर्ण सम्मान है। इसी का स्त्रीलिंग ‘महोदया’ है। इसके (महोदय के) समकक्ष ‘महाशय’ और ‘मान्यवर’ शब्द हैं। इन्हें (महोदय-महोदया) क्रमश: ‘स्वामी’ और ‘स्वामिनी’ भी कहते हैं।

आप जब किसी को सम्बोधित करते हुए, ‘महोदय’ वा/अथवा ‘महोदया’ लिखेंगे तब (यहाँ ‘तब’ के स्थान पर ‘तो’ का प्रयोग अशुद्ध है।) ऐसे लिखेंगे :– महोदय! महोदया!; परन्तु आप जैसे ही महोदय, और महोदया, लिखेंगे वैसे ही आपका लेखन अशुद्ध हो जायेगा; क्योंकि ! यह विरामचिह्न ‘सम्बोधनचिह्न’ कहलाता है और , यह चिह्न अल्प विरामचिह्न।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ सितम्बर, २०२३ ईसवी।)