‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से आयोजित राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद
आज (१४ मई) आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के जन्म-दिनांक (१५ मई) के पूर्व-दिवस मे ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से ‘आचार्य पं० महावीरप्रसाद द्विवेदी की भाषिक दृष्टि की प्रासंगिकता’ विषय पर एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमे देश के कई विचारकोँ की सहभागिता रही।
आशा राठौर (सहायक प्राध्यापक– हिन्दी, श्री राघवेन्द्र सिंह हजारी शासकीय महाविद्यालय हटा, दमोह, म० प्र०) ने कहा, “द्विवेदी जी जिस तरह से अपने जीवन मे नैतिकता और मर्यादा को महत्त्व देते थे, साहित्य और भाषा के क्षेत्र मे भी उसी नैतिकता और मर्यादा के पक्षधर भी थे। उन्होँने हिन्दी को परिष्कृत कर, अन्य लेखकोँ को भी परिनिष्ठित हिन्दी मे साहित्य रचना करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया। उनकी यह हिन्दी-साधना हमेशा याद की जायेगी।”
विश्वदीपक उपाध्याय (प्राचार्य एवं सहायक प्राध्यापक– एस० बी० जे० डिग्री कॉलेज, विसावर, हाथरस) ने कहा, ''आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी-भाषा के उन अद्वितीय शिल्पियोँ मे हैँ, जिन्होँने न केवल साहित्य का स्वरूप गढ़ा, बल्कि भाषा को विचार, संस्कार और राष्ट्रचेतना की भूमि पर प्रतिष्ठित किया। उनके भाषिक चिन्तन मे जो अनुशासन, सौन्दर्य और स्पष्टता है, वह आज की विकृत होती भाषा-प्रवृत्तियो के मध्य दीपक की लौ की तरह प्रज्वलित होती प्रतीत होती है। उन्होँने भाषा को मात्र लेखन का साधन नहीँ, बल्कि एक जीवन्त सांस्कृतिक परम्परा का संवाहक भी माना।"
आयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (व्याकरणवेत्ता-भाषाविज्ञानी, प्रयागराज) ने कहा, "हमारे देश के बहुसंख्य विद्वज्जन, सम्पादक, शिक्षकगण, साहित्यकार, समीक्षक आदिक आचार्य द्विवेदी की भाषा-प्रशस्ति तो करते हैँ; परन्तु उनके द्वारा प्रशस्त किये गये भाषिक पथ पर चलने की अपनी इच्छाशक्ति व्यक्त नहीँ कर पाते, जिसका परिणाम है, समाज मे भाषा के स्खलित रूप का विस्तार। आचार्य द्विवेदी के युग के बाद आज भाषा-परिष्कार मे बहुत सम्भावनाएँ हैँ; परन्तु 'जैसा चल रहा है, चलने दो' की प्रवृत्ति सर्वत्र लक्षित हो रही है।'' समय आ गया है, व्याकरण-स्तर पर भाषा के रूप-सौन्दर्य को विकृत करनेवाले वर्ग पर वैचारिक प्रहार करने का।''
बृजेन्द्रनाथ त्रिपाठी (शिक्षक, गोरखपुर) ने कहा,"आचार्य द्विवेदी जी ने अपनी भाषा-व्यवस्था और भाषा-समीक्षा से साहित्य-जगत् मे नवीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना और वैज्ञानिक चिन्तन का अलख जगाकर खड़ी बोली की उर्वर-भूमि मे जो सारस्वत प्रेरणा प्रदान की, उसका हिन्दीजगत् सदैव ऋणी रहेगा।''
डॉ० राघवेन्द्रकुमार त्रिपाठी 'राघव' (वरिष्ठ पत्रकार, हरदोई) के अनुसार, "आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एक साहित्यकार नहीँ, अपितु ऐसे युगपुरुष थे, जिन्होँने भाषा को अस्त्र बनाकर बौद्धिक सामर्थ्य के आधार पर विधर्मियोँ से युद्ध लड़ा। आजीवन अंगरेज़ी-शिक्षा और भाषिक घालमेल का विरोध किया। भाषा को सर्वसमर्थ और सर्वग्राह्य बनाने के लिए द्विवेदी जी के दिखाये मार्ग का आलम्बन लेकर हम-सबको प्रयास करने की ज़रूरत है।''
आदित्यकुमार त्रिपाठी (शिक्षक, हरदोई) ने कहा, "आज हिन्दी मे बड़ी संख्या मे भाषाई अशुद्धता देखने मे आती हैँ, ऐसे मे, द्विवेदी जी के दिखाये रास्ते पर आगे बढ़कर और शुद्ध शब्दोँ के प्रयोग को बढ़ावा देकर ही हिन्दीभाषा को सौन्दर्य-सम्पन्न किया जा सकता है। इस कार्य की शुरूआत हमे अपने-आप से ही करना होगा, जैसा कि गायत्री-परिवार का एक ध्येय वाक्य है, ''हम सुधरेँगे, युग सुधरेगा।"