संविधान-दिवस के अवसर पर विशेष प्रस्तुति
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प्रयागराज। 'सर्जनपीठ', प्रयागराज की ओर से राष्ट्रीय संविधान-दिवस के अवसर पर २६ नवम्बर को एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमे अनेक अधिवक्ता और अन्य प्रबुद्धजन की सहभागिता रही।
विषय-प्रवर्तन करते हुए, जबलपुर उच्च न्यायालय की अधिवक्ता रश्मि मल्होत्रा ने बताया– बेशक, आज संविधान ख़तरे मे है। जिन्हेँ संविधान के ‘स’ की समझ नहीँ और देश के स्वयम्भू महान् बने हुए हैँ, संविधान को उनसे ख़तरा है। आज हमारे संविधान की वैसी स्थिति है, जैसी कि किसी बच्चे के हाथोँ मे चाबीभरा खिलौना हो।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता रामसेवक त्रिपाठी ने कहा– हम लोग संविधान के सम्बन्धित अनुच्छेद और धारा के अन्तर्गत अपने मुक़द्दमे लड़ते हैँ; परन्तु अपने मुवक्किल को न्याय नहीँ दिला पाते, जिसका मुख्य कारण है, ‘न्यायिक प्रक्रियाओँ मे विलम्ब का होते रहना’। लोग संविधानमार्ग से चलने की जगह ‘सुविधा-शुल्क’ देकर अपना काम करवा लेने मे आगे रहते हैँ।
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– आज बहुसंख्य संविधानवेत्ता मौन बने हुए हैँ। भारत गणराज्य का संविधान २६ नवम्बर, १९४९ ई० को इसलिए संकलित कर, लिखा नहीँ गया था कि देश के उच्चपदस्थ लोग उसका माखौल उड़ायेँ, बल्कि इसलिए लिखा गया था कि देश उससे अनुशासित होकर, जनकल्याण की ओर बढ़े। आश्चर्य तब और होता है जब क़ानून बनानेवाली सरकार का विधायी अंग व्यवस्थापिका ही मनमानी पर उतर आये और कहीँ कोई रोकटोक नहीँ, फिर इस दिशा मे शासन-प्रशासन की गम्भीरता भी नहीँ दिखती।
नाम-उद्घाटन न करने की शर्त पर एक न्यायाधीश क ख ग ने कहा– पूरा सिस्टम ही भ्रष्ट है। न्यायाधीशोँ को साफ़ शब्दोँ मे धमकी दी जाती है और कहा जाता है– हम संविधान हैँ। हमारे अनुसार चलना होगा, अन्यथा सारे परिवार की कर्मकुण्डली खोलकर रख दी जायेगा। तिहाड़ जेल मे अभी काफ़ी जगह है।