हिमगिरि-चरणों मे शीश नवा, मैंने शुरू किया चलना, तपती रेती पर चलकर भी, शीतलता को मिटने न दिया। सघन वनों की छाया मे, कभी न मेरा मन ललचाया। इस शाश्वत सत्य का ज्ञान मुझे, जो रुका उसने अस्तित्व गँवाया।। छोड़ शिखर नीचे उतरी, मेरी धारा कुछ बदल गयी। ऊपर से नीचे को आना झरना बन झर-झर उतर गयी। मैं बन गयी अविरल प्रपात, जिसने पत्थरों को चीरा। तब वर्ण मेरा था दुग्ध धवल, जिसने मेरा उत्साह बढाया।। तब सोचने लगा मेरा ये मन, यदि रुक जाती मैं मार्ग में ही, कैसे बन पाती जल प्रपात? जब पतन हुआ नीचे आयी, सीधे खाईं में जा के गिरी। खाईं से जब बहकर निकली, तब नया नाम मुझे मिला नदी। अब मेरा मन तो प्रतिपल, कल-कल की ध्वनि से गाता है, अपने संघर्षों की कहानियाँ, सम्पूर्ण विश्व को सुनाता है। मानव भी तो परमात्मा के चरणों में करके प्रणाम, इस धरती पर आता है। पर जीवन के तपते मार्ग। देखते ही, क्यों घबरा जाता है। कठिनाइयों के आते ही, निज मार्ग भूल जाता है। कैसी विडंबना है कि, आकर्षणों में फँस जाता है। रुक जाता है आत्मिक विकास, वो शाश्वत सत्य भुलाता है। कर्मपथ को त्यागते ही, अपना अस्तित्व गँवाता है। परमात्मा पुत्र होकर भी, दुनिया का चाकर बनकर रह जाता है। पर हे मानव! तू आत्मज्ञान की गहरायी में उतर के देख। इस दुनिया की घाटी को छोड़, आत्म में ही अवस्थित हो के देख। पहचान तेरा उत्कर्ष है क्या? तेरा आदि है क्या? तेरा अंत है क्या? तू जान तेरा स्वरूप है क्या? तू ही है ब्रह्म, तू ही अगाध, तू भी है मुझ सा प्रपात। तेरे मार्ग की हर कठिनाई तब, चरणों में शीश नवायेगी। हर संकट, मार्ग की हर बाधा, खुद ही दूर हो जायेगी। जीवन मार्ग न तपेगा तब, सुख का सागर बन जायेगा। निर्मलता और शीतलता से तेरा मन भर जायेगा।।
✍️ अनुश्री त्रिपाठी मिश्रा