● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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पाप का ख़ज़ाना भरता रहा; कोई मरे-कोई जिये, फ़र्क़ नहीँ पड़ता; बेहयाई ने गैंडे की खाल बना दिया; सब कुछ बेअसर। सत्ता का नशा भी ग़ज़ब का होता है– कुर्सी बनी रहे; भले लाश-पर-लाश बिछती रहे; मगर क्रूरता की पराकाष्ठा ऐसी कि जो बच्चे अथक अध्यवसाय कर, अपने माँ-बाप के सपने को साकार करने के लिए अहर्निश अध्ययनशील रहे, उनमे से बहुसंख्य का हमारे देश की ‘सिस्टम’ ने भविष्य बरबाद तो किया ही, कुछ का जीवन भी छीन लिया।
नीट (यू० जी०)– २०२६ के प्रश्नपत्र-लीककाण्ड के प्रभाव और परिणाम ने उन चार छात्र-छात्राओँ की जीवनलीला समाप्त कर दी है, जो सपना देखते थे; एम्स और अन्य महत्त्वपूर्ण मेडिकल कॉलेजोँ मे दाख़िला पाने के लिए व्यग्र थे और अपनी तैयारी के प्रति आश्वस्त भी; परीक्षा देने के बाद विश्वस्त थे कि उनके शरीर पर सफ़ेद कोट और पैण्ट होगा; परन्तु लक़्वाग्रस्त देश की सिस्टम ने उन्हेँ सफ़ेद कफ़न ओढ़ाकर अपनी निर्ममता और निर्लज्जता का जो सुबूत पेश किया है, वह थूकने-लायक़ भी नहीँ है।
आज सुबूतोँ का एक ऐसा टीला बन गया है, जो चीख़-चीख़कर कह रहा है– देश का सिस्टम हत्यारा है। हम जिन्हेँ ‘कल’ की तस्वीर कहते आ रहे हैँ, उनकी कितनी दयनीय और शोचनीय स्थिति है, जिनपर विचार करते ही मोबाइल फ़ोन के की-पैड पर दिख रहे अक्षर-मात्राओँ पर थिरक रही हमारी अँगुलियाँ काँप उठती हैँ; हमारी संवेदना इतनी घनीभूत हो जाती है कि हमारा अवचेतन चेतना के धरातल पर आकर प्रश्नो का संजाल ला फेँकता है।
एन० सी० आर० बी० (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के आँकडोँ पर विश्वास करेँ तो देश मे वर्ष २०१९ से २०२१ के मध्य ३५ हज़ार से अधिक छात्र-छात्राओँ ने आत्महत्या कर, देश की शिक्षा-परीक्षा-पद्धति तथा न्याय-व्यवस्था को कठघरे मे ला खड़ा किया है; मगर केन्द्र और राज्य की सरकारेँ चुप्पी साधे रहीँ। केन्द्र-सरकार की ओर से संसद् मे दलील पेश की जाती है कि शिक्षण-संस्था और संस्थानो मे कौन्सिलिंग सेल, ग्रीवांस सेल और सहायता-तन्त्र बनाये गये हैँ। यदि इन सबकी व्यवस्था की गयी है तो इनका प्रभाव शिक्षण-संस्था और संस्थानो मे दिखता क्योँ नहीँ?
जब हम नीट के स्याह पक्ष की विवेचना करते हैँ तब मन-मस्तिष्क भारी पड़ने लग जाता है और हमारी दसोँ अँगुलियाँ सरकारी सिस्टम की ओर सिस्टम को उखाड़ फेलने के लिए उठ खड़ी होती हैँ। देश का सर्वाधिक बदनाम स्थान राजस्थान राज्य का ‘कोटा’ है, जिसे डॉक्टरोँ को बनाने का कारख़ाना कहा जाता है। आँकड़े निर्ममता और निर्लज्जतापूर्वक बोलते सुने जा रहे हैँ :– हमने वर्ष २०२२ और १५, २०२३ मे २९ कोटा मे रहकर ‘नीट’ की तैयारी करनेवाले छात्रा-छात्राओँ के जीवन लील लिये। इतना ही नहीँ, वर्ष २०२४ मे नीट की २० छात्र-छात्राओँ ने भी अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली तो वर्ष २०२५ मे भी वही स्थिति दिखी।
नीट-प्रश्नपत्र-लीककाण्ड– २०२६ ने ऐसे छीनी चार ज़िन्दगी
एक– अंशिका पाण्डेय (दिल्ली)
२० वर्षीया अंशिका उत्तर-दिल्ली के आज़ादपुर-स्थित लालबाग़ की रहनेवाली थी। वह आदर्शनगर, दिल्ली मे रहकर तैयारी करते हुए, दो विफल प्रयास के बाद तीसरी बार नीट (यू० जी०) की परीक्षा दे चुकी थी, जिसमे पिछली बार मात्र चार अंकोँ की कमी से चूक गयी थी। इस बार अपनी सफलता के प्रति विश्वस्त थी; परन्तु उसे जैसे ही पता चला कि नीट का प्रश्नपत्र लीक करा दिया गया है और उस परीक्षा को भी रद्द कर दिया गया है, उसे गहरा आघात पहुँचा; अन्तत: उसने १४ मई को मौत को गले लगा लिया। अंशिका के पिता ने बताया था कि वह पिछले तीन वर्ष से नीट की तैयारी मे लगी थी और उसे इस वर्ष अच्छे रैंक आने की उम्मीद थी।
दो– ऋतिक मिश्र (लखीमपुर खीरी, उत्तरप्रदेश)
२१ वर्षीय ऋतिक का नीट की पात्रता अर्जित करने की दिशा मे यह तीसरा प्रयास था। वह मूल रूप से ईसानगर थानान्तर्गत हसनपुर कटौली गाँव का रहनेवाला था। उसके पिता अनूप मिश्र के अनुसार, ऋतिक अपने पिछले दो प्रयासोँ की विफलता को सफलता का रूप देने के लिए तत्पर था। इस बार की परीक्षा मे उसका बेहतर प्रयास था; परन्तु पेपर-लीकेज और परीक्षा रद्द करने की सूचना पाकर वह भीतर से टूट गया था। ऋतिक ने भी मंज़िल की ओर ले जानेवाला कोई रास्ता न पाकर, १४ मई को मौत को हमसफ़र बना लिया।
तीन– प्रदीप मेघवाल (सीकर, राजस्थान)
२३ वर्षीय प्रदीप सीकर मे किराये का कमरा लेकर तैयारी कर रहा था, जोकि झुंझुनू (राजस्थान) का मूल निवासी था। उसके पिता एक मज़्दूर हैँ, जो अपने बेटे को डॉक्टर के रूप मे देखने के लिए अपनी ज़मीन बेच चुके हैँ और क़र्ज़ से लद गये हैँ। उसके चाचा श्रवण मेघवाल ने बताया कि प्रदीप ने इस बार के नीट मे बेहतर प्रदर्शन किया था। उसे उम्मीद थी कि वह इस बार ६५० अंक लायेगा। प्रश्नपत्र-लीक और परीक्षा निरस्तीकरण की सूचना पाते ही प्रदीप ने अपनी इहलीला समाप्त कर ली।
चार– सिद्धार्थ हेगडेच्या (कुर्टोरिम, गोवा)
सत्रह वर्षीय सिद्धार्थ, जो कुर्टोरिम, गोवा मे रहकर नीट (यू० जी०) की तैयारी कर, नीट– २०२६ मे बेहतर प्रदर्शन किया था। उसे अपने चयन के प्रति पूर्ण विश्वास था; परन्तु प्रश्नपत्र का लीक होना और परीक्षा रद्द होने की सूचना ने उसकी आशा पर ऐसा पानी फेरा कि उसने १३ मई की शाम मे मडगाँव-स्थित अपने घर मे अपने गले मे फन्दा कसकर मृत्यु को गले लगा लिया था। वह मडगाँव के ही एक हायर सेकण्डरी मे पढ़ता था। उस छात्र ने अपने अन्तिम पत्र मे लिखा था :– मै अब किसी परीक्षा मे शामिल नहीँ होना चाहता।
हमने यहाँ यथार्थ के धरातल जो एक वास्तविक शब्दचित्र खीँचा है, उसका निष्कर्ष मनुष्यता को तार-तार करनेवाला है। सच तो यह है कि प्रतिस्पर्द्धा की एक अजूबी दुनिया मे हमारे विद्यार्थी-वर्ग पढ़ाई के भार को झेल नहीँ पा रहा है; स्वयं के सपनो का बोझ, माता-पिता एवं अन्य स्वजन-परिजन की अपेक्षा, सामाजिक होड़ और भविष्य की चिन्ता सकारात्मक चिन्तन पर कहीँ भारी पड़ता दिख रहा है। ऐसे मे, यदि आत्महत्या एकमात्र विकल्प है तो यह एक प्रकार का आत्मघाती सोच है। हमारे सम्मुख जितनी प्रकार की विफलता और विसंगति क्योँ न खड़ी होँ, हमे उन्हेँ क्रमश: बुद्धि और स्वस्थ शक्ति से पराजित कर, वैकल्पिक पथ प्रशस्त करने के प्रति मन-मस्तिष्क को केन्द्रित करना होगा। (समाप्त)
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